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अमेरिकी कलाकार वासवो एक्स. वासवो: भारतीय कला को मिले नए रंग

एक अमेरिकी कलाकार ने राजस्थानी चित्रकारों और फोटो में रंग भरने के विशेषज्ञ के साथ मिलकर हाथ से रंग भरे श्वेत-श्याम प्रिंट, मिनिएचर पेंटिंग और उनकी खास बॉर्डर बनाने के काम को बढ़ावा देकर पुरानी कला में नई जान डालने का प्रयास किया है जिसमें दोनों ही देशों की संस्कृति की झलक है।


वह अपने घर में नंगे पांव चलना पसंद करते हैं, भोजन में ज़्यादा मिर्ची पसंद आने लगी है, सड़क किनारे के ढाबा अच्छे लगने लगे हैं और चटाई पर पालथी मारकर बैठने से भी परहेज नहीं है। मिलवॉकी, विस्कॉन्सिन में जन्मे अमेरिकी कलाकार वासवो एक्स. वासवो ने पिछले आठ सालों में भारत को अपना घर बनाया है। भारत से उनका पहला वास्तविक संपर्क 16 साल पहले हुआ और उन्होंने ऐसा जुड़ाव महसूस किया कि वह बार-बार यहां आते रहे और फिर अपनी कलात्मक अभिव्यक्ति को नए आयाम देने के लिए यहीं रहने का फैसला कर लिया।

ग्रामीण भारत के लोगों और स्थलों के अपने सीपीया फोटोग्राफों (जो इस कलाकार ने अमेरिका में अपने डार्करूम में प्रोसेस किए) के लिए जाने जाने वाले वासवो ने उदयपुर, राजस्थान में भारतीय कलाकारों के साथ मिलकर काम किया है और वर्ष 2005 से उदयपुर को अपना घर बना रखा है। उन्होंने भारतीय कला और शिल्प को पुनर्जीवित करने के लिए भी अपना योगदान किया है जिसमें श्वेत-श्याम फोटो में रंग भरने और भारतीय मिनिएचर पेंटिंग की अभिव्यक्ति का दायरा बढ़ाने का काम भी शामिल है।

अपने स्टूडियो में श्वेत-श्याम फोटो खींचने और फिर उनमें रंग भरने का आइडिया किस तरह से उभरा? वासवो कहते हैं, ‘‘पुराने स्टूडियो फोटोग्राफ देखकर और उन्हें एकत्र करने के क्रम में मुझे भी यह सूझा कि मैं खुद स्टूडियो फोटोग्राफी में हाथ आजमाऊं।’’ वह कहते हैं, ‘‘शुरू में मेरा आइडिया था कि डार्करूम में रसायनों के जरिये सीपिया फोटो ही बनाऊं... लेकिन उदयपुर में स्टूडियो में अपरिचित रसायनों, पानी और गर्मी की पेचीदिगियां कुछ ज़्यादा ही बाधक साबित हुईं।’’ इस बीच वह डिजिटल कैमरे का इस्तेमाल करने लगे और डिजिटल प्रिंट लेने लगे।

वासवो और मिनिएचर पेंटिंग बनाने वाले आर. विजय के बीच दुभाषिए के रूप में काम करने वाले राजेश सोनी ने डिजिटल श्वेत-श्याम प्रिंट देखे तो वासवो से बोल उठे, ‘‘चाचा, मैं इनमें रंग भर सकता हूं।’’ वासवो को यह विचार पसंद आया लेकिन वह क्वालिटी को लेकर कुछ सशंकित थे। सोनी कहते हैं, ‘‘यह काम आसान नहीं था। चाचा को मेरे शुरुआती प्रयास पसंद नहीं आए। उन्हें लगा कि मैं कुछ ज़्यादा ही गहरे रंग इस्तेमाल कर रहा हूं और मुझे हल्के शेड इस्तेमाल करने की सलाह दी। लेकिन उनके साथ चर्चा के बाद मैंने इन प्रिंट में रंग भरने के लिए एक खास शैली विकसित की जिसके नतीजे अद्भुत थे।’’ सोनी के दादा प्रभुलाल फोटोग्राफर थे और हाथ से श्वेत-श्याम फोटो में रंग भरने के विशेषज्ञ। वह पूर्व मेवाड़ रियासत के महाराजा भोपाल सिंह के लिए काम करते थे।

इन हाथ से रंग भरे श्वेत-श्याम प्रिंटों को पसंद करने का वासवो एक कारण और बताते हैं। ‘‘हाथ से रंग भरने से मेरे पूर्ववर्ती सीपीया पि्रंटों की कोमलता बरकरार रहती है और साथ ही कुछ पुराने समय की झलक भी रहती है...। इससे मनोभावों और अभिव्यक्ति की नई संभावनाओं का संसार भी खुलता है।’’ चारा बेचने वाले एक व्यक्ति का हाथ से रंगा चित्र द चारा टाला वाला वासवो का पसंदीदा है। ‘‘यह चित्र श्वेत-श्याम स्वरूप में भी बहुत अच्छा था। लेकिन सोनी के द्वारा रंग भरे जाने के बाद यह चित्र वाकई जादुई हो गया।’’

वासवो के स्टूडियो से पूरी तरह तैयार होने वाला हर हाथ से रंग भरा पि्रंट कम से कम चार लोगों के मिलेजुले प्रयासों का नतीजा होता है- बैकड्रॉप में रंग भरने वाला, मॉडल, रंग भरने वाला और एक फोटोग्राफर के रूप में वासवो खुद। बैकड्रॉप तैयार करने का काम उदयपुर के स्थानीय कलाकार जेनुल खान, अनिल अतरिश और चिमन डांगी करते हैं। मॉडल अक्सर वे स्थानीय लोग होते हैं जो वासवो और उनकी टीम के सदस्यों के संपर्क में आते हैं। वासवो कहते हैं, ‘‘मैं कुछ-कुछ एक फिल्म निर्देशक की तरह महसूस करता हूं। मरे दिमाग में यह विचार होता है कि मैं क्या चाहता हूं और बहुत से लोग मेरे साथ काम करके इस विचार को हकीकत में बदलते हैं...।’’

सोनी वर्ष 2006 से वासवो के साथ काम कर रहे हैं। वह अब तक 250 से ज़्यादा श्वेत-श्याम प्रिंटों में रंग भर चुके हैं। सोनी कहते हैं, ‘‘जैसे ही कोई प्रिंट मेरे पास आता है तो मैं सोचने लगता हूं कि इस पर किन-किन रंगों की ज़रूरत पड़ेगी और फिर कई परतों में रंग भरने का काम करता हूं।’’ वासवो उनके काम में ज़्यादा हस्तक्षेप नहीं करते। वासवो कहते हैं, ‘‘राजेश को पता है कि मुझे क्या चाहिए। लेकिन कभी-कभी मैं उन चीजों के बारे में बता देता हूं जो मुझे पसंद नहीं होती।’’

एक और क्षेत्र जिसमें वासवो ने भारतीय कलाकारों के साथ गठजोड़ किया है, वह है मिनिएचर पेंटिंग का। उदयपुर का इलाका मिनिएचर पेंटिंग के लिए जाना जाता है और यह स्वाभाविक है कि वासवो जैसा कलाकार इस पर प्रयोग करना चाहे। वह कहते हैं, ‘‘मिनिएचर उन भावनाओं और विचारों को अभिव्यक्त करती हैं जिन्हें फोटोग्राफी के माध्यम से अभिव्यक्त नहीं किया जा सकता।’’ वासवो की मिनिएचर पेंटिंग आर. विजय द्वारा चित्रित की जाती हैं और इनमें से ज़्यादातर आत्मकथा स्वरूप में हैं। वासवो कहते हैं, ‘‘मैं जो कुछ भी किसी मिनिएचर पेंटिंग में देखना चाहता हूं, उसका कच्चा चित्र बनाता हूं, आर. विजय उसे परिष्कृत करता है और मेरे अनुमोदन के बाद उसमें रंग भरे जाते हैं... ये मिनिएचर भारत में मेरे जीवन से संबद्ध विभिन्न पहलुओं की ओर इंगित करती हैं।’’ वह बताते हैं, ‘‘निश्चय ही इनमें आर. विजय की अपनी भावनाओं और शैली का भी समावेश होता है।’’

वासवो की मिनिएचर जैसे ए प्रेयर फ़ॉर रेन और पानी समकालीन मुद्दों से रूबरू हैं। ए प्रेयर फ़ॉर रेन उस समय तैयार की गई जब राजस्थान वर्षा को लेकर चिंतित था और पानी मिट्टी के घड़े और पात्र से पानी पीने के सही पर्यावरण अनुकूल तरीके को बताती है।

आर. विजय ने कला की कोई औपचारिक शिक्षा हासिल नहीं की है। लेकिन वह बचपन से ही पेंटिंग करते आ रहे हैं। वह कहते हैं, ‘‘पहले मैं पारंपरिक काम ही ज़्यादा कर रहा था जो राजाओं, रानियों और प्राकृतिक दृश्यों तक सीमित था। वासवो ने मुझे नए विषयों से परिचित कराया और मेरा दायरा बढ़ाया।’’ उन्होंने पिछले तीन साल में वासवो के लिए 75 मिनिएचर तैयार किए हैं।

वासवो की एक और खोज स्थानीय कलाकार शंकर कुमावत हैं। वह वासवो और आर. विजय द्वारा मिलकर तैयार की गई मिनिएचर पेंटिंग के लिए विशेष बॉर्डर बनाने का काम करते हैं। वासवो कहते हैं, ‘‘बॉर्डर तैयार करने में शायद वह सबसे बेहतर है। कई बार मैं जो कुछ बताता हूं, वह उससे भी बेहतर आइडिया लेकर आता है।’’ कुमावत वासवो के साथ पिछले एक साल से काम कर रहे हैं। वह कहते हैं, ‘‘मैं मिनिएचर को गौर देखता हूं और फिर बॉर्डर में कुछ ऐसा करने का प्रयास करता हूं कि उसमें पेंटिंग से विषम दृश्य हो।’’ कुमावत रंग खुद ही, इस तरह से तैयार करते हैं कि वे सालों तक चलें ओर सूर्य की रोशनी में फीके न पड़ें। वह चमक और समृद्धता प्रदान करने के लिए बॉर्डर में असली सोने के पाउडर का भी इस्तेमाल करते हैं।

वासवो उदयपुर केअपने स्थानीय सहयोगी कलाकारों से खुश हैं। वह कहते हैं, ‘‘हम एक टीम की तरह काम करते हैं। ये लोग मेरे आइडिया को साकार करते हैं... उदयपुर के कलाकारों के साथ काम करने के क्रम में मुझे ऐसा महसूस होता है कि मैंने इन कलाओं को बहाल करने या इसके विस्तार को प्रोत्साहन दिया है। मैं नहीं सोचता कि यदि ‘‘स्टूडियो इन राजस्थान’’ शृंखला नहीं होती तो राजेश सोनी इतनी गंभीरता के साथ श्वेत-श्याम प्रिंटों में रंग भरने का काम करते... और आर. विजय के साथ काम करने से मुझे लगा कि मैंने मिनिएचर पेंटिंग की अभिव्यक्ति की संभावनाओं का विस्तार किया है।’’

स्थानीय कलाकार भी खुद को खुश बताते हैं। उन्हें पर्याप्त पैसा मिल जाता है और जब किसी प्रदर्शनी में अच्छी बिक्री होती है तो वासवो उन्हें ‘‘बोनस’’ भी देते हैं। यहां तक कि मॉडल भी, जिनमें से ज़्यादातर कामगार या किसान होते हैं, लगभग आधा घंटे के काम के लिए ‘‘अच्छी धनराशि’’ पाते हैं।

भारतीय प्रिंटमेकिंग जैसे कि लकड़ी पर काम भी वासवो को बेहद लुभाता है। वह इन्हें एकत्र कर रहे हैं और उन्हें उमीद है कि ‘‘...ये एक दिन किसी शैक्षिक प्रदर्शनी लगाने के लायक प्रतिनिधित्व कर पाएंगी जिन्हें और जगह भी ले जाया जा सके।’’

वासवो का भारत से नाता उनके गुणसूत्रों में ही है। उनके पिता जॉर्ज वासवो द्वितीय विश्व युद्ध के समय भारत से होकर गए थे। वासवो के अनुसार, ‘‘जब मैं बच्चा था तो मुझे उस जहाज के बारे में अक्सर बताया जाता जो गोला-बारूद से भरा था और जिसमें मुंबई में विस्फोट हो गया। उन सालों की यह चर्चित घटना थी और जब यह हुई तो मेरे पिता पास में एक पब में थे। जब मैं बच्चा था तो मैंने भारत के बारे में किताबें पढ़ीं और चीतों, हाथियों और अनजाने स्थलों के बारे में बच्चों जैसे रोमांटिक आइडिया थे।’’

कला में अपनी दिलचस्पी के बारे में उन्होंने कब जाना? ‘‘मेरी मां लूसिल ने मेरा परिचय कला से कराया। वह ड्राइंग और पेंटिंग करती थीं और साथ ही कला कार्यक्रम भी आयोजित करती थीं।’’ उनके द्वारा बनाई बर्फ से ढके एक पुराने फार्म हाउस की पेंटिंग आज भी वासवो के मिलवॉकी में घर में है। उनके पिता भी थोड़ी-बहुत पेंटिंग करते थे। वासवो को याद है कि वे किस तरह फूलों की पेंटिंग बनाते थे। बड़े होने पर वासवो ने मिलवॉकी सेंटर फ़ॉर फोटोग्राफी और फ्लॉरेन्स, इटली के स्टूडियो मरांगोनी, सेंटर फ़ॉर कन्टमपररी फोटोग्राफी, में फोटोग्राफी का अध्ययन किया। मिलवॉकी सेंटर बाद में बंद हो गया।

वासवो ने अपनी कला को भारत और अमेरिका में प्रदर्शित किया है। उनकी इंडिया पोएम्स शृंखला के सीपीया फोटोग्राफ मुंबई (2004, 2006), कोच्चि (2003, 2007), पणजी (2003) और उदयपुर समेत कई भारतीय शहरों में प्रदर्शित किए गए। वर्ष 2007 में ये वासवो के गृहनगर में हैगर्टी म्यूज़ियम ऑफ़ आर्ट में भी प्रदर्शित किए गए। हाथ से रंग भरे फोटोग्राफों की ‘‘ए स्टूडियो इन राजस्थान’’ शृंखला और मिनिएचर पेंटिंग कोच्चि (2008), नई दिल्ली (2009), और जेनोआ, इटली (2009) में प्रदर्शित की गईं। उन्होंने अपनी कलाकृतियों को श्रीलंका कैंडी और कोलंबो में और अमस्टर्डम, नीदरलैंड में भी प्रदर्शित किया है। उन्हें इस गठजोड़ कर किए इस कार्य का कैसा प्रतिफल मिल रहा है? ‘‘मैं खुश हूं। हमारी बिक्री अच्छी रही। लोग वाकई इन्हें पसंद कर रहे हैं।’’

उनके कलाकार मन को लगता है कि भारत की कला के प्रति देश और विदेश में जागरूकता बढ़ रही है। ‘‘... इस देश में मौजूद प्रतिभा को देखकर मैं अभिभूत हूं।’’ उन्हें लगता है कि अमेरिका ओर भारत के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान से चीजें बेहतर हो सकती हैं। ‘‘बहुत से भारतीयों ने मुझसे अपनी इच्छा जताई है कि वे ज़्यादा समकालीन अमेरिकी कला को देखना चाहते हैं जो दुर्भाग्यवश सागर पार कर ज़्यादा बार भारत तक नहीं आ रही है। इसी तरह अमेरिका को भी भारतीय कला को प्रदर्शित करने और उसका महत्व पहचानने का लंबा सफर तय करना है...।’’ वह कहते हैं, ‘‘कला अकेले ही सांस्कृतिक खाइयों को भरने में सक्षम भले ही न हो, लेकिन यह कम से कम उन्हें पहचानने और समझने में तो मदद कर ही सकती है।’’