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एमिली मे: अब उत्पीड़न का मुकाबला तकनीक से

अधिकतर बढि़या विचारों की तरह इसकी शुरुआत भी सामान्य तरीके से हुई। वर्ष 2005 की गर्मियों में एमिली मे और दोस्तों के एक समूह ने आपस में बातचीत की कि न्यू यॉर्क सिटी की सड़कों पर छेड़छाड़ कितनी बढ़ गई है। मे कहती हैं, ‘‘सीटियों, उपहास और भद्दे संकेतों से हमें यह एहसास होने लगा था कि ये सार्वजनिक सड़कें हमारे लिए नहीं हैं। हम अपने ही शहर में असुरक्षित महसूस कर रहे थे।’’ वह कहती हैं, ‘‘हम महिलाओं तक पहुंचना चाहते थे, उनके साथ घटी घटनाओं के बारे में जानना चाहते थे और उन्हें यह जताना चाहते थे कि वे अकेली नहीं हैं। तब ब्लॉगिंग की दुनिया आज जैसी नहीं थी, लेकिन यह उन तक पहुंचने का एक बेहतर जरिया थी।’’

इसी का परिणाम था होलाबैक, सड़कों पर होने वाली छेड़छाड़ को खत्म करने को समर्पित एक वेबसाइट। महिलाएं इस ऑनलाइन मंच पर अपने अनुभव साझा कर सकती हैं और तस्वीरें भी अपलोड कर सकती हैं।

इस वेबसाइट की सह-संस्थापिका मे कहती हैं, ‘‘सड़कों पर होने वाली छेड़छाड़ एक ऐसा अपराध है, जिसे शायद ही कभी गंभीरता से लिया जाता है चाहे आप दुनिया के किसी भी हिस्से में क्यों न रहते हों।’’

अनुभवों को जानना
अन्य ब्लॉगों और लोगों की जुबानी इस वेबसाइट का इतना प्रचार हो गया कि छह महीने के भीतर ही इस पर न्यू यॉर्क के बाहर से, बल्कि पूरे अमेरिका से घटनाओं व अनुभवों की मानो बरसात हो गई। मे कहती हैं, ‘‘हम समझ गए कि सड़कों की छेड़छाड़ सिर्फ हमारे शहर तक ही सीमित नहीं है, यह एक वैश्विक महामारी है।’’

अधिक लोगों ने उम्मीद नहीं की थी कि इतने कम समय में होलाबैक के इतने सारे सदस्य बन जाएंगे, लेकिन यह तो बहुत ही कम लोगों ने सोचा होगा कि 2010 से यह आईफोन और एनड्रायड एप्लिकेशन पर उपलब्ध होगी जिससे उपभोक्ताओं को अपने साथ घटी घटना की रिपोर्ट सेकेंडों में भेजने की सुविधा होगी। इस एप्लिकेशन के जरिये भेजा जाने वाला डाटा अपने आप व्यवस्थित होता जाता है और होलाबैक से फॉलोअप ई-मेल में उपभोक्ता से घटना की विस्तृत जानकारी ली जाती है।

मे टेक्नोलॉजी वाली पृष्ठभूमि से नहीं हैं। फिर प्रॉडक्ट के विकास के लिए धन जुटाना भी बेहद मुश्किल था। मे बताती हैं, ‘‘हमने सोचा कि फाउंडेशन हमारी वित्तीय मदद करेंगे, मगर किसी ने हमारी सहायता नहीं की।’’ तब मे और उनके साथियों ने ‘किकस्टार्टर’ वेबसाइट पर आर्थिक अनुदान के लिए सूचनाएं पोस्ट कीं और 400 लोगों से उन्हें इसके लिए ज़रूरी 12,500 डॉलर की इमदाद मिल गई। मे कहती हैं, ‘‘दरअसल 400 लोगों ने इस एप्लिकेशन को जन्म दिया है।’’ इसके बाद इन लोगों ने इस एप्लिकेशन को एप्पल को सौंपा, जिसने इसे अपनी स्वीकृति दी। 1000 से अधिक लोग इसे अब तक डाउनलोड कर चुके हैं। मे के मुताबिक, ‘‘... फिलहाल यह सिर्फ अमेरिका में उपलब्ध है। हम परख रहे हैं कि लोग इसे किस रूप में देखते हैं।’’ इसके शुरुआती वर्जन में लोग सिर्फ घटनास्थल का ही संकेत कर पाते थे, लेकिन अब वे साथ-साथ पूरी घटना का विवरण भेज सकते हैं।

वक्त की कीमत
होलाबैक पांच वर्षों तक बिना किसी धन के चली। वर्ष 2010 से मे, जो अब कार्यकारी निदेशक हैं, और एक अंशकालिक सदस्य को तनख्वाहें मिलनी शुरू हुईं। होलाबैक को काफी सारा धन निजी मदद के रूप में मिला और वॉलंटियरों ने जो अपना कीमती समय इस वेबसाइट को दिया, उससे भी इसकी कमाई हुई। कुछ लोगों, संस्थानों और निजी दानदाताओं ने जहां होलाबैक को धन दिया, वहीं वॉलंटियरों ने ब्लॉग को मॉनीटर करने के अलावा इसके लिंक्स की देखभाल और इसकी सामग्रियों के संपादन का दायित्व संभालकर अपना बहुमूल्य योगदान दिया। मे कहती है, ‘‘यह वाकई चकित करने वाली बात है कि वॉलंटियरों से संचालित होने के बावजूद हमने अत्यंत प्रतिभाशाली लोगों को अपनी तरफ आकर्षित किया और आज इसके छह विभाग हैं,  जिन्हें  अलग-अलग टीम लीडर संभाल रहे हैं।’’ इसके प्रारंभिक सदस्यों में से एक बोर्ड अध्यक्ष है। ज़्यादातर पीएच.डी. डिग्री के लिए चले गए हैं।

मे कहती हैं, ‘‘कुछ संस्थापक सदस्य अब पहले की तरह समय नहीं दे पाते। लेकिन वर्षों पहले हमने जो फैसले किए थे, वे आज भी खरे लगते हैं और जो निर्णय मैं आज लेती हूं, उनमें भी वे दिखते हैं। दरअसल, इस प्रोजेक्ट के साथ ही हम भी बड़े हुए हैं।’’

भारत में होलाबैक
होलाबैक अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय है और हरेक तिमाही में कम से कम छह वेबसाइट शुरू करने की इसकी योजना है। मुंबई से संचालित इसकी भारतीय वेबसाइट की शुरुआत जनवरी में ही हुई है और इसे आइशा जाकिर चला रही हैं। जाकिर बताती हैं, ‘‘सड़कों पर होने वाली छेड़छाड़ भारत में एक गंभीर समस्या है। यहां यह आम तौर पर ‘ईव टीजिंग’ के नाम से जाना जाता है। ‘टीजिंग’ शब्द उस ओछे कृत्य को कुछ हल्का कर देता है, जिसके दंश की पीड़ा इसे झेलने वाली औरत ही जानती है। उसके लिए इस टीजिंग का अर्थ अलग-थलग करने वाला, पीड़ादायक और कुंठित करने वाला कृत्य है।’’

महिला संगठनों, प्रकाशनों, ब्लॉगों और अखबारों के जरिये अभी इस वेबसाइट के प्रचार की प्रक्रिया शुरुआती स्टेज में ही है कि छेड़छाड़ से संबंधित बेधने वाली वाली कहानियां इस पर बरसने लगी हैं। एक नमूना देखिए  ‘‘मैंने जान-बूझकर अपनी नाप से बड़े कपड़े खरीदे हैं और जब भी मैं बाहर जाती हूं, तो बैगी लिबास ही पहनती हूं, क्योंकि मैंने महसूस किया है कि जब भी मैं कुछ ऐसा पहनती हूं, जिससे मेरी स्किन दिखती हो, तो मर्द मुझे ज्यादा घूरते हैं। दरअसल, उनका घूरना इस बात पर नहीं निर्भर करता कि मैंने क्या पहना है, बल्कि वह इस पर ज़्यादा निर्भर होता है कि मैंने कुछ खुले कपड़े पहने हैं। मेरे पहनावे के बारे में तो ऐसा नहीं होना चाहिए।’’

नई दिल्ली में एक और वेबसाइट शुरू की जा रही है।

इस तरह की कहानियों ने मे और जाकिर को प्रोत्साहित किया है कि वे अपने काम को जारी रखें। मे स्कूलों और साइट चलाने वाली महिलाओं को इस बात का प्रशिक्षण देती हैं, उन्हें विस्तार से समझाती हैं कि छेड़छाड़ किस तरह का प्रभाव डालती है और इस तरह की स्थिति से वे कैसे निपट सकती हैं। मे बताती हैं, ‘‘एक बार एक सोलह साल की लड़की ने मुझे बताया कि उसके साथ सड़कों पर छेड़छाड़ आम बात है। उसने सोचा कि ऐसा तो होता रहता है। ऐसे में किसी न किसी रूप में वह लड़की भी इस कृत्य के लिए ज़िम्मेदार थी। हमें यह समझ लेना चाहिए कि सड़कों की छेड़छाड़ वास्तव में खूबसूरती या आपकी वजह से नहीं की जाती। यह सीधे-सीधे अपनी ताकत का बेजा प्रदर्शन है।’’ इसलिए अगली बार जब कोई आपको ‘हे बेबी’ कहकर छेड़े, तो आपको पता होना चाहिए कि आपको क्या करना है। होलाबैक से तत्काल संपर्क कीजिए!

पारोमिता पेन ऑस्टिन, टेक्सस में पत्रकार हैं।