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टीबी से मुकाबले के लिए तकनीक

  • टीबी के सैंपल की जांच करता लैब तकनीशियन। फोटोग्राफ: साभार यूएसएड
  • नई दिल्ली में मार्च 2021 में भारत के केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के केंद्रीय टीबी डिविज़न द्वारा आयोजित विश्व टीबी दिवस कार्यक्रम में ट्रेस-टीबी का स्टॉल। फोटोग्राफ: साभार यूएसएड
  • यूएसएड द्वारा वित्तपोषित प्रोजेक्ट आर्टिफ़िशियन इंटेलिजेंस की मदद से टीबी से मुकाबले में आने वाली दो बड़ी चुनौतियों से निपटने में मदद करने का प्रयास कर रहा है। इनमें स्ट्रिप रीडिंग का ऑटोमेशन और जांच के विश्लेषण से यह पता लगाना कि रोगी टीबी के किस स्ट्रेन का शिकार है।

यूएसएड द्वारा वित्तपोषित एक प्रोजेक्ट में टीबी से मुकाबले में आने वाली चुनौतियों से जूझने में मदद के लिए आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल किया जा रहा है।


टीबी अभी भी वैश्विक स्तर पर जन स्वास्थ्य के लिए चुनौती बनी हुई है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की वैश्विक टीबी रिपोर्ट 2020 के अनुसार, दुनिया में टीबी के कुल रोगियों में से 26 प्रतिशत भारत में हैं, जो सर्वाधिक है। अनुमान है कि टीबी से 4,36,000 से अधिक लोगों की हर साल मौत हो जाती है, जो इसे देश में मौत के मामले में दस सबसे बड़े कारणों में से एक बनाता है।

ये मौतें इसलिए ज्यादा त्रासदीपूर्ण हैं कि इनमें से ज्यादातर लोगों का इलाज किया जा सकता था। यदि रोग की ठीक से पहचान हो जाती और समय मुताबिक इलाज होता। टीबी से मुकाबला करना भारत के दीर्घकालीन लक्ष्यों में रहा है और सरकार ने टीबी के उन्मूलन के लिए वर्ष 2025 का लक्ष्य रखा है। यूएसएड और वाधवानी इंस्ठीट्यूट फ़ॉर आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस के बीच गठजोड़ इन प्रयासों में योगदान दे रहा है। वाधवानी इंस्टीट्यूट फ़ॉर आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस मुंबई स्थित नॉन-प्रॉफ़िट संगठन है, जो सामाजिक भलाई के लिए आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल करता है।

यूएसएड द्वारा वित्तपोषित प्रोजेक्ट आर्टिफ़िशिय इंटेलिजेंस की मदद से टीबी से मुकाबले में आने वाली दो बड़ी चुनौतियों से निपटने में मदद करने का प्रयास कर रहा है। इनमें रीडिंग का ऑटोमेशन और जांच के विश्लेषण से यह पता लगाना कि रोगी टीबी के किस स्ट्रेन का शिकार है। इससे यह सुनिश्चित हो जाता है कि रोगी सही इलाज ले रहा है और यह भी अनुमान लगाया जा सकता है कि कौनसे रोगियों के रोजमर्रा की दवा को लेना बंद करने के आसार ज्यादा हैं। टीबी के इलाज में नियमित तौर पर और समय पर दवा लेना महत्वपूर्ण मुद्दा है क्योंकि इलाज छह माह से लेकर दो साल तक चलता है। और यदि रोगी दवा लेना बंद कर दे तो वह टीबी के ऐसे स्ट्रेन का शिकार हो सकता है जिसका इलाज मुश्किल हो सकता है।

इस प्रोग्राम में यूएसएड की भागीदारी की अगुवाई करने वाले डॉ. अमर एन. शाह कहते हैं कि ये दो खोजें भारत में टीबी के उन्मूलन को गति दे सकती हैं। वह कहते हैं, ‘‘यदि आप रोग की पहचान सही से करें और ठीक इलाज करें, तो हम मौत के मामले ज़ीरो डाउन कर सकते हैं।’’ 85 लाख डॉलर का चार साल के गठजोड़ वाला टीबी उन्मूलन प्रोजेक्ट ट्रेस-बी  जून 2929 में शुरू हुआ।

विश्व स्वास्थ्य संगठन का अनुमान है कि भारत में हर साल 26 लाख 40 हज़ार से ज्यादा लोग टीबी से संक्रमित होते हैं। लोगों को अब पहले से ज्यादा संख्या में लाइन प्रोब ऐसे दिया जा रहा है- जो बलगम की आणविक जांच है और यह पता लगाता है कि रोगी को किस स्ट्रेन की टीबी है। सटीक स्ट्रेन का पता लगाना बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि तभी बीमारी के इलाज के लिए प्रभावी दवा दी जा सकती है। समस्या यह है कि जांच के नतीज़ों का विश्लेषण करने में समय लगता है। ये कागज की स्ट्रिप पर रेखाओं के तौर पर हासिल होते हैं और लैब तकनीशियन 24 स्ट्रिप की शीट के विश्लेषण में लगभग एक घंटे का समय लगाते हैं। ऑप्टिकल रीडर और आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस प्रोग्राम की मदद से हज़ारों घंटे का श्रम बचेगा, न ही इसससे थकावट होगी और गलती की गुंजाइश कम होने से नतीजे भी सटीक आएंगे।

ऐसे लोग जो रोजाना की दवा लेना बंद कर देते हैं, उनका इलाज करना ज्यादा मुश्किल काम है। इसे फॉलो-अप हानि माना जाता है और लंबे समय तक इलाज के मामलों में ऐसा असामान्य नहीं है। जन स्वास्थ्य प्रणाली पहले से ही प्रयास कर रही है कि लगातार दवा को लेने के मामले और बढ़ें। रोगियों को एक टोल-फ्री नंबर देकर कहा जाता है कि वे हर दिन फोन कर बताएं कि उन्होंने टीबी की गोली ले ली है। जिन लोगों के पास मोबाइल फोन की सुविधा नहीं है, उनके यहां महीने में दो बार स्वास्थ्य कार्यकर्ता जाकर उन्हें नियमित तौर पर दवा लेने को प्रोत्साहित करते हैं। यदि यह पता चल जाए कि किन रोगियों के दवा लेना बंद करने के आसार अधिक हैं तो स्वास्थ्य कार्यकर्ता अपनी ओर से सक्रिय हो सकते हैं और रोगी द्वारा दवा लेना बंद करने तक की प्रतीक्षा नहीं करेंगे। डॉ. शाह कहते हैं, ‘‘हम पहले ही यह पता लगा सकते हैं कि कौन दवा लेना बंद कर सकता है, इसलिए हम उनकी मदद कर सकते हैं।’’

लेकिन यह पता लगाना कैसे संभव है कि कौनसा रोगी दवा लेना बंद कर देगा? एआई सिस्टम टेलीफोन से हासिल जानकारी वाले आंकड़ों और स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं द्वारा घर पर विजिट से जुटाई जानकारियों के आधार पर उस प्रोफाइल का पता लगाता है जिसके इलाज छोड़ देने की आशंका है।

इसके अतिरिक्त भारत के राष्ट्रीय टीबी उन्मूलन प्रोग्राम में निकक्षय नामक इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्डिंग और रिपोटिंग सिस्टम है जिसमें 60 लाख टीबी रोगियों के बारे में सालों की जानकारी है। इस डेटाबेस से एआई पूर्वानमान और सटीक हो जाते हैं।

ट्रेस-बी प्रोग्राम के तहत ‘‘भारत में टीबी उन्मूलन के लिए एआई सॉल्यूशन का ब्लूप्रिंट’’ पूर्ण होने के करीब है। डॉ. शाह के अनुसार यह महत्वपूर्ण दस्तावेज़ रोगियों की निजता के साथ इस बात के दिशानिर्देश भी तय करेगा कि स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के बीच चिकित्सा जानकारियों का आदान-प्रदान कैसे हो। इसमें रोगियों की दवा लेना बंद कर देने के मामलों को रोकने के लिए फॉलो-अप और लाइन प्रोब ऐसे टीबी टेस्ट के लिए इन्फ्रास्ट्रक्चर ज़रूरतों पर भी निर्देश होंगे।

डॉ. शाह के अनुसार यह ब्लूप्रिंट इस साल बाद में प्रकाशित हो जाएगा। इसका टीबी से मुकाबले में बड़ा प्रभाव पड़ना चाहिए। ‘‘एक बार हमारे पास यह ब्लूपिं्रट गया और हम डेटा साझा करने को लेकर आश्वस्त हो गए, तो नए एआई सॉल्यूशन पर शीघ्रता से अमल कर सकेंगे।’’

बर्टन बोलाग स्वतंत्र पत्रकार हैं। वह वाशिंगटन, डी.सी. में रहते हैं।