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वैक्सीन से ज़िंदगी का बचाव

  • यहां दिख रहे 20 मार्च वायल में कोविड-19 की संभावित वैक्सीन है, जिसे रॉकविल, मैरीलैंड की कंपनी नोवावैक्स ने विकसित किया है। (© एंड्रू कबालेरो-रेनॉल्ड्स/एएफ़पी/गेटी इमेजेज

संक्रामक रोगों से बचाव के लिए तैयार वैक्सीन लाखों लोगों का जीवन बचा रही हैं। कोविड-19 और अन्य कई बीमारियों से मुकाबला करने के लिए अमेरिका के वैज्ञानिकों ने वैश्विक प्रयासों में महत्वपूर्ण योगदान किया है।


वैक्सीन के कारण बहुत-सी घातक बीमारियों को फैलने से रोकने में मदद मिली है। इससे हमें चेचक का उन्मूलन कर पाए हैं। अमेरिका, जर्मनी, ब्रिटेन और अन्य देशों ने कोविड-19 से मुकाबले के लिए प्रभावी वैक्सीन तैयार की हैं जो महामारी का मुकाबला करने में मदद कर रही हैं।

अमेरिका की दवा कंपनी मॉडर्ना और जर्मनी आधारित बायोएनटेक ने अमेरिका से संचालित फ़ाइज़र के साथ भागीदारी कर पहली मैसेंजर आरएनए वैक्सीन विकसित की है जो कोविड-19 से बचाव में काफी प्रभावी साबित हुई है। अमेरिकी कंपनी जॉनसन एंड जॉनसन ने एकल खुराक वाली वैक्सीन विकसित की है जो दुनियाभर में कोविड-19 के मामलों में कमी लाने में मदद कर रही है।

अमेरिका कम और मध्यम आय वाले देशों और अर्थव्यवस्थाओं को 61 करोड़ वैक्सीन दान दे रहा है। इसमें से ज्यादातर दान कोवैक्स सुविधा के तहत है, जो वैक्सीन का समान वितरण करने के लिए अंतरराष्ट्रीय भागीदारी है। अमेरिका ने कोवैक्स के समर्थन में वैक्सीन एलायंस गावी को भी चार अरब डॉलर दिए हैं।

राष्ट्रपति बाइडन ने आह्वान किया था कि अमेरिका को विश्व के ‘‘वैक्सीन आयुधागार’’ के रूप में काम करना चाहिए। ऐसा बायोमेडिकल रिसर्च में अमेरिकी निवेश और पूरी दुनिया में मौजूद संक्रामक रोगों पर नियंत्रण और उन्मूलन के अमेरिकी शोधकर्मियों के दीर्घकालीन प्रयासों के परिणामस्वरूप ही हो पाता है।

अमेरिकी फिजिशियन, चिकित्सा शोधकर्मी और विषाणु विशेषज्ञ जोनास द्वारा वर्ष 1955 में पोलियो की वैक्सीन विकसित करने से पहले लाखों बच्चे पोलियो का शिकार हो जाते थे। यू.एस. सेंटर्स फ़ॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन के अनुसार, दुनियाभर में पोलियो के टीकाकरण अभियान के कारण वर्ष 1988 से वर्ष 2013 के बीच पोलियो के मामले 99 प्रतिशत तक कम हो गए। लगातार टीकाकरण के प्रयासों से पोलियो उन बीमारियों में शामिल हो सकता है जिनका पूर्ण उन्मूलन हुआ।

अमेरिकी बायोमेडिकल वैज्ञानिक और नोबेल पुरस्कार विजेता द्वारा वर्ष 1963 में वैक्सीन विकसित करने से पहले तक खसरे से हर साल 26 लाख लोग मारे जाते थे। आज खसरे के मामले अपेक्षाकृत कम हैं। सीडीसी के अनुसार, वर्ष 2018 में 142,000 लोगों की खसरे से मौत हुई।

अमेरिकी शोधकर्मियों का अन्य रोगों के लिए वैक्सीन विकसित करना जारी है। अरब प्रायद्वीप में सर्वप्रथम वर्ष 2012 में मानवों में आने के बाद मर्स वर्ष 2014 में अमेरिका में फैल गया। वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि यह बीमारी कैसे फैलती है और इसके लिए संभावित वैक्सीन तैयार करने का प्रयास कर रहे हैं।

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ एलर्जी एंड इंफेक्शियस डिजीजेज के अनुसार, कोविड-19 के लिए एक वैक्सीन का जल्द क्लिनिकल परीक्षण हो सका क्योंकि यह मर्स के लिए विकसित की जा रही वैक्सीन के आधार पर ही तैयार की गई थी।

एबोला वायरस रोग में बुखार के साथ आंतरिक रक्त बहाव और मौत तक हो सकती है। मनुष्य में यह शरीर के द्रव पदार्थों के संपर्क में आने से फैलता है। यह प्राथमिक तौर पर अफ्रीका में फैला था। वर्ष 2021 में यह कोंगो में भी फैला।

अमेरिकी और यूरोपीय नियामकों ने हाल के वर्षों में इस बीमारी के ज़ायरे स्ट्रेन के लिए अमेरिकी फार्मा कंपनी मर्क की वैक्सीन को मान्यता दी है। एबोला पर काबू करने के प्रयासों में दाता देश के तौर पर अमेरिका सबसे आगे है और वह एबोला फैलने पर राष्ट्रीय तैयारी और कार्रवाई में मदद देता है।

ज़ीका वायरस प्राथमिक तौर पर मच्छरों से फैलता है। वर्ष 2015 और 2016 में इसके कारण पश्चिमी गोलार्द्ध में हज़ारों बच्चे विकृतियों के साथ जन्मे। अमेरिकी रक्षा विभाग के वाल्टर रीड आर्मी इंस्टीट्यूट फ़ॉर रिसर्च ने ज़ीका के लिए वैक्सीन विकसित करने में तेज़ी से प्रगति की और वर्ष 2016 के आखिर में इसके क्लिनिकल परीक्षण शुरू हुए।

मच्छरों से फैलने वाले एक और रोग मलेरिया का दुनिया की आधी आबादी पर खतरा मंडराता है यानी तीन अरब 40 करोड़ लोग इसकी चपेट में आ सकते हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने वर्ष 2005 में मलेरिया इनिशिएटिव की शुरुआत की। उससे पहले अफ्रीका में इससे हर साल सात लाख लोग मौत का शिकार हो जाते थे। वर्ष 2017 तक इसकी दवाओं के विस्तारित वितरण और मच्छरदानी जैसे रोकथाम के उपायों से मौतों की संख्या अब कम होकर 300,000 प्रतिवर्ष रह गई है।

अमेरिकी शोधकर्मी उस अंतरराष्ट्रीय प्रयास का हिस्सा हैं, जिसके तहत ऐसी वैक्सीन विकसित की जा रही है जो 5 से 17 महीने के बच्चों में मलेरिया को रोकने में 77 प्रतिशत कारगर है।

टीबी ऐसे बैक्टीरिया से होती है जो फेफड़ों को शिकार बनाता है। संक्रमित व्यक्ति के छींकने या खांसने पर बैक्टीरिया हवा में पहुंच जाते हैं और बीमारी एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में पहुंच जाती है। इससे हर साल 15 लाख लोग मरते हैं और विश्व में संक्रामक रोगों से होने वाली मौतों में यह एड्स से भी आगे है।

आलेख: साभार शेयरअमेरिका