कल्पना चावला और अंतरिक्ष शटल

भारतीय अमेरिकी कल्पना चावला, उस अमेरिकी अंतरिक्ष शटल कोलंबिया की उड़ान एसटीएस-87 में अंतरराष्ट्रीय दल का हिस्सा थीं जिसने 1997 में एक सफल मिशन को पूरा किया। जब सूर्य से तीसरे ग्रह पृथ्वी पर इंसान राजनीति और दूसरी छोटी-मोटी हरकतों में उलझा था, तब इसके छह सदस्यीय दल के सदस्य अंतरिक्ष में चल रहे थे, रिमोट कंट्रोल उपकरणों को नियंत्रित कर रहे थे और लाखों मील कक्षा में चक्कर लगाते हुए तमाम तरह के प्रयोगों में जुटे थे।

जनवरी/फ़रवरी 1998

कल्पना चावला और अंतरिक्ष शटल

अंतरिक्ष यात्री कल्पना चावला अपने प्रशिक्षण के दौरान नासा के केसी-135 ज़ीरो-ग्रैविटी यान में माइक्रोग्रैविटी का अहसास करते हुए। फोटोग्राफ: साभार नासा

भारतीय अमेरिकी कल्पना चावला, उस अमेरिकी अंतरिक्ष शटल कोलंबिया की उड़ान एसटीएस-87 में अंतरराष्ट्रीय दल का हिस्सा थीं जिसने पिछली दिसंबर में एक सफल मिशन को पूरा किया है। जब सूर्य से तीसरे ग्रह पृथ्वी पर इंसान राजनीति और दूसरी छोटी-मोटी हरकतों में उलझा था, तब इसके छह सदस्यीय दल के  सदस्य अंतरिक्ष में चल रहे थे, रिमोट कंट्रोल उपकरणों को नियंत्रित कर रहे थे और लाखों मील कक्षा में चक्क्र लगाते हुए तमाम तरह के प्रयोगों में जुटे थे।

कल्पना चावला कहा करती थीं कि करनाल में रहते हुए उन्होंने कभी भी नहीं सोचा था कि वह अंतरिक्ष की सीमाओं को कभी पार करेंगी। यही उनके लिए काफी था जब उनके अभिभावकों ने टैगोर स्कूल से पढ़ाई के बाद उन्हें इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिले की अनुमति दी। फिर कल्पना वहीं नहीं रुकीं। उन्होंने पंजाब इंजीनियरिंग कॉलेज से एयरोनॉटिकल इंजीनिरिंग में स्नातक की डिग्री ली और उसके बाद मास्टर्स डिग्री के लिए वह अमेरिका की टेक्सस यूनिवर्सिटी चली गई। उन्होंने 1988 में कलैराडो यूनिवर्सिटी से एयरोस्पेस इंजीनियरिंग में पीएच.डी. डिग्री हासिल की। पिछली नवंबर में चावला पहली अमेरिकी भारतीय महिला अंतरिक्ष यात्री थीं जिन्होंने केप कैनेवरल, ़फ्लोरिडा से एक सफल अंतरिक्ष मिशन के लिए उड़ान भरी। कोलंबिया जब अंतरिक्ष की उड़ान के लिए तैयार था, उसी समय  केनेडी स्पेस सेंटर के कर्मचारियों के साथ चावला का परिवार भी उनका उत्साह बढ़ाने के लिए वहां मौजूद था।

चावला का जन्म करनाल, हरियाणा, में हुआ था लेकिन उन्होंने अमेरिका की नागरिकता ले ली थी और ़फ्लाइट इंस्ट्रक्टर ज्यां-पियरे हैरीसन के साथ विवाह कर लिया था। एक एस्ट्रोनॉट होने के अलावा, उनके पास सिंगल और एक से ज्यादा इंजनों वाले वायुयान, सिंगल इंजन सी प्लेन और ग्लाइडरों को उड़ाने का लाइंसेंस है। वह प्रमाणीकृत फ्लाइट इंस्ट्रक्टर भी थीं। 1987 में बतौर पायलट पात्रता हासिल करने के बाद चावला ने एक दूसरी चुनौती के बारे में सोचना शुरू कर दिया और वह थी नासा के स्पेस शटल प्रोग्राम के लिए आवेदन। उन्हें  1988 में नासा के कैलिफोर्निया स्थित रिसर्च सेंटर में रिसर्च साइंटिस्ट के तौर पर नौकरी मिल गई। उन्होंने 1993 में केलिफोर्निया के ओवरसेट मेथड्स, इंक, लॉस एल्टॉस में वाइस प्रेसिडेंट और रिसर्च साइंटिस्ट के रूप में कार्यभार संभाला। 1994 में उनका चुनाव नासा में एस्ट्रोनॉट के रूप में प्रशिक्षण के लिए कर लिया गया। उन्होंने प्रशिक्षण मार्च 1995 में जॉनसन स्पेस सेंटर (जेएससी) ह्यूस्टन, टेक्सस में शुरू किया।

चौथी अमेरिकी माइक्रोग्रेविटी पेलोड शटल फ्लाइट एसटीएस- 87 ने अंतरिक्ष में 15 दिन, 16 घंटे, 34 मिनट का मिशन पांच दिसंबर 1997 को पूरा किया और यह बतौर मिशन स्पेशलिस्ट कल्पना चावला का पहला अनुभव था। उन्हें ऐसा दोबारा करने की आशा है। वह और उनके सहयोगियों ने अपनी यात्राओं में 104.5 लाख किलोमीटर की दूरी नापी। इसमें अंतरराष्ट्रीय चालक दल के भी सदस्य थे जिसमें, मिशन स्पेशलिस्ट, जापान के नेशनल स्पेस डवलपमेंट एजेंसी के ताकाओ दोई- स्पेस वॉक करने वाले पहले जापानी अंतरिक्ष यात्री, यूक्रेन की नेशनल स्पेस एजेंसी के पेलोड स्पेशलिस्ट लियोनिद केडेनयक और तीन दूसरे अमेरिकी- मिशन कमांडर केविन आर. क्रेगेल, पायलट स्टीवन लिंजी और मिशन स्पेशलिस्ट विंस्टन स्कॉट शामिल थे। इस दौरान इन सभी अंतरिक्ष यात्रियों ने यूक्रेन सहभागिता प्रयोग के तहत कई प्रयोग किए।

कुछ ऐसे प्रयोग भी किए गए जिसमें अंतरिक्ष में खाद्य संसाधनों के विकास के लिए पौधों के पॉलीनेशन के अलावा मजबूत धातु और त्वरित कंप्यूटर चिप के निर्माण के परीक्षण शामिल थे। इन सभी में करीब 560 लाख डॉलर का खर्च आया। उन्हें सौर अवलोकन के लिए कल्पना चावला द्वारा तैनात जटिल सेटेलाइट स्पार्टन से भी निपटना पड़ा। एक जरा से गड़बड़ी के कारण स्पेस वॉकर्स दोई और स्कॉट को अतिरिक्त काम का बोझ उठाना पड़ा। उन्हें एक करोड़ डॉलर के सेटेलाइट की बहाली का काम करना पड़ा।

और अब, पृथ्वी पर वैज्ञानिक हासिल डेटा के विश्लेषण का काम जारी रखेंगे। कल्पना चावला के लिए जब मॉडलिंग का विषय सामने आता है, तो वह आमतौर पर ़फ्लो फिजिक्स के न्यूमेरिकल सिमुलेशन और विश्लेषण का ही होता है। जब उनसे अपने क्षेत्र में महिला होने की चुनौती के बारे में पूछा गया तो उन्होंने जवाब दिया, ‘‘मैंने वास्तव में, कभी भी ऐसा नहीं सोचा, चाहे पढ़ाई करते हुए, या फिर दूसरा कोई भी काम करते हुए, यह कभी नहीं सोचा कि मैं एक महिला हूं, या फिर एक छोटे शहर से आती हूं या फिर किसी दूसरे देश की हूं। मैंने भी कुछ सपने देखे थे, जैसे कि दूसरे देखते हैं। मैंने उन सपनों का पीछा किया। और किस्मत से मेरे इर्द-गिर्द जो लोग थे, उन्होंने मुझे हमेशा प्रोत्साहित किया और कहा कि, अगर यही है जो तुम करना चाहती हो, तो आगे बढ़ो।’’

मूलत: प्रकाशित जनवरी/फ़रवरी 1998



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