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रक्षा, आतंकवाद से मुकाबला और कानून पर अमल

  • अमेरिका और भारत की नौसेना के जहाज मार्च 2018 में हिंन्द महासागर में खास विन्यास में। यू.एस. नैवी/मास कम्युनिकेशन स्पेशलिस्ट थर्ड क्लास स्पेंसर रॉबर्ट्स
  • भारत के रक्षा मंत्री प्रणव मुखर्जी और अमेरिकी रक्षा मंत्री डॉनल्ड एच. रम्स़फेल्ड ने जून 2005 में वाशिंगटन,डी.सी. में अमेरिका-भारत सुरक्षा संबंधों के लिए नया फ्रेमवर्क स्थापित किया। साभार: defense.gov
  • अमेरिका और भारत के सैनिक वर्ष 2018 में उत्तराखंड में चौबत्तिया मिलट्री स्टेशन में युद्धाभ्यास में भाग लेते हुए। फोटोग्राफ साभार: अमेरिकी थल सेना
  • अमेरिका और भारत की नौसेनाएं मालाबार 2018 के दौरान समुद्र-में-संपूर्ति अभ्यास में भाग लेते हुए। फोटोग्राफ: यू.एस. नैवी/मास कम्युनिकेशन स्पेशलिस्ट सेकिंड क्लास विलियम मैकन
  • भारतीय वायु सेना 11 सी-17 ग्लोबमास्टर एयरक्रा़फ्ट संचालित करती है। फोटोग्राफ: मनीष स्वरूप © एपी इमेजेज
  • भारत की राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने नवंबर 2019 में नई दिल्ली में भारत, अमेरिका, जापान और आस्ट्रेलिया के साथ पहली बार काउंटरटेरेरिज्म एक्सरसाइज का आयोजन किया। फोटोग्राफ साभार: @State_SCA/Twitter
  • भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और अमेरिका के रक्षा मंत्री मार्क टी. एस्पर ने अक्टूबर 2020 में अमेरिका-भारत 2+2 मंत्री स्तरीय वार्ता से पहले नई दिल्ली में मुलाकात की। फोटोग्राफ: अल्ताफ कादरी©एपी इमेजेज

साझा सिद्धांतों और अपने नागरिकों के मज़बूत सहयोग के बूते अमेरिका और भारत ने अपने सैन्य और सुरक्षा बलों के बीच सहयोग को लगातार बढ़ाया है। इसके लिए सूचनाएं साझा करने, रक्षा योजना बनाने, युद्धाभ्यास, आदान-प्रदान, रक्षा औद्योगिक सहयोग, आतंकवाद से मुकाबले और कानून पर अमल से जुड़ी गतिविधियों पर ध्यान दिया गया है।


दुनिया के दो सबसे बड़े लोकतंत्र होने के नाते अमेरिका और भारत की साझा ज़िम्मेदारी है कि हम अपने नागरिकों का बचाव करें और हिंद-प्रशांत क्षेत्र को सुरक्षा और स्थायित्व देने में मदद करें। उपलब्धियों के लंबे इतिहास और मानवता को योगदान देने वाले गर्वीले राष्ट्रों के तौर पर हम अपने नागरिकों की रक्षा करने और बाहरी दबाव से अपनी संप्रभुता बचाने को लेकर प्रतिबद्ध हैं। और उद्यमी राष्ट्र होने के नाते हम जानते हैं कि समृद्धता और विकास के लिए सुरक्षा आवश्यक है।

इन साझा सिद्धांतों के अनुरूप और हमारे नागरिकों के मज़बूत समर्थन के बूते, अमेरिका और भारत ने अपने रक्षा और सुरक्षा बलों के बीच लगातार सहयोग को बढ़ाया है। ऐसा सूचनाएं साझा करके, आतंकवाद से मुकाबले और कानून पर अमल से जुड़ी गतिविधियों के जरिये, रक्षा योजना और अभ्यास, और रक्षा उद्यम सहयोग के जरिये किया गया है। इसके लिए हमारे देशों को कुछ सबसे संवेदनशील जानकारियों को और तकनीकों को साझा करना पड़ा है और साथ ही, संयुक्त प्रयासों के लिए काफी लोग और संसाधन भी उपलब्ध कराने पड़े हैं। 

हमने ऐसा किया है क्योंकि अमेरिका और भारत, दोनों साझा खतरों और चुनौतियों का सामना कर रहे हैं, जिनमें सीमा बदलने की इकतरफा कार्रवाई और नियम आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को बिगाड़ने से लेकर क्षेत्रीय और वैश्विक आतंक नेटवर्क और नशीले पदार्थों की अवैध खरीद-फरोख्त और साइबर जगत में गड़बड़ी मचाने वाले लोग शामिल हैं। हमने आज अपने देशों को सुरक्षित रखने के साथ ही, हमारे रक्षा एवं सुरक्षा बलों के बीच अंतरसंचालन क्षमता बढ़ाने और सहयोग की आदत बढ़ाने की चाह की है, जिससे कि हम आने वाले कल की चुनौतियों से निपटने को तैयार रहें। 

साझा खतरों से निपटने के हमारे साझा संकल्प और कौशल को सशक्त कर हम अपनी जनता और विश्व को अपने विकास लक्ष्यों, लोकतांत्रिक जीवनशैली और नियम आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की रक्षा के लिए अपना निश्चय स्पष्ट करते हैं।  

 

रक्षा और सुरक्षा सहयोग का इतिहास 

अमेरिका-भारत रक्षा और सुरक्षा सहयोग नई बात नहीं है। कोरियाई युद्ध (1950-1953) के समय भारत सरकार ने अमेरिका को युद्ध में चीन के कूद पड़ने की आशंका और अमेरिकी सैनिकों को खतरे के बारे में चेताया था। भारत और अमेरिका ने तब संयुक्त राष्ट्र में साथ मिलकर दक्षिण कोरिया के खिलाफ हमले की निंदा की। भारत ने बाद में संयुक्त राष्ट्र बलों की मदद के लिए 60वीं पैराशूट फ़ील्ड एम्बुलेंस रेजीमेंट को कोरियाई प्रायद्वीप भेजा, जिसमें अमेरिकी सैनिक भी थे।   

बाद में, भारत की उत्तरी सीमा पर तनाव बढ़ने पर भारत सरकार और वहां के लोगों से एकजुटता दिखाने के लिए राष्ट्रपति ड्वाइट डी. आइज़नहावर ने दिसंबर 1959 में भारत की यात्रा की। अक्टूबर 1962 में युद्ध छिड़ने पर अमेरिका ने भारत का साथ दिया और सैन्य मदद के भारतीय आग्रह पर तुरंत कार्रवाई की। अमेरिका ने विमानों से हथियार, कपड़े ओर गोला-बारूद भेजा, पहले कोलकाता में और फिर अग्रिम मोर्चे पर, अमेरिकी वायु सेना के सी-130 के ज़रिये।  

संबंधों में तनाव की लंबी अवधि के बाद हमारी रक्षा और सुरक्षा भागीदारी फिर से प्रारंभ हुई और 1990 एवं 2000 के दशक में नियमित सैन्य अभ्यास, नए नीतिगत समझौतों, और आतंकवाद से मुकाबले में बढ़ते सहयोग के चलते इसका विस्तार हुआ। वर्ष 1992 में अमेरिका और भारत की नौसेनाओं ने समुद्री सुरक्षा और आपदाओं से निपटने के लिए वार्षिक संयुक्त अभ्यास शुरू किए, जिन्हें मालाबार अभ्यास कहते हैं। वर्ष 1995 में हमारे बढ़ते सैन्य सहयोग को हमारी सरकारों ने रक्षा संबंधों पर तय सहमति के जरिये इसे औपचारिक स्वरूप दे दिया। इसके बाद वर्ष 2005 में अमेरिकी रक्षा मंत्री डॉनल्ड रम्स़फेल्ड और भारत के रक्षा मंत्री प्रणव मुखर्जी ने अमेरिका-भारत रक्षा संबंधों के नए फ्रेमवर्क पर हस्ताक्षर कर इसे और व्यापक बना दिया। वर्ष 2004 में हमारी थल सेनाओं ने युद्ध अभ्यास शुरू किया और वायु सेनाओं ने कोप इंडिया अभ्यास का शुभारंभ किया।   

दुखद है कि अमेरिका और भारत, दोनों ने ही लंबे समय से आतंकवाद को झेला है, जिसमें ऐसे दूसरे देशों के समूह शामिल हैं जिनके सरकारों से जुड़े लोगों से संबंध हैं। आतंकवाद से मुकाबले में सहयोग के लिए हमने अपने साझा हितों को पहचाना है और अपने संकल्प को सशक्त बनाने और हमारे संयुक्त प्रयासों के लिए मिलकर काम करना शुरू किया। वर्ष 2000 में हमने नीतियों के समन्वय और सूचनाओं को साझा करने के लिए आतंकवाद को जवाब देने के लिए संयुक्त कार्य समूह बनाया। हमने जुलाई 2010 में काउंटरटेरेरिज्म इनिशिएटिव के साथ इस सहयोग को और बढ़ाया। इसमें समुद्री और सीमा सुरक्षा, जांच और फॉरेन्सिक, आतंकवादियों को वित्तीय मदद, आतंकवाद से निपटने की इकाइयों जैसे राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड के बीच सहयोग शामिल है। इसी साल हमने आतंकवाद से मुकाबले और कानून पर अमल में सहयोग के लिए उच्चस्तरीय मदद सुनिश्चित करने और हमारा संरचनात्मक संवाद बेहतर करने के लिए केबिनेट स्तर का होमलैंड सिक्योरिटी डायलॉग शुरू किया।   

नवंबर 2010 में अपनी मुंबई की यात्रा के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने मैक्सिमम सिटी में नवंबर 2008 के हमले को याद किया जिसमें अमेरिकी और भारतीय मारे गए थे। उन्होंने आतंकवादियों से मुकाबले में हमारे संयुक्त प्रयासों की महत्ता पर बल दिया। उन्होंने कहा, ‘‘हमारी सरकारों ने पहले से अधिक निकटता के साथ काम किया है, खुफिया जानकारियां साझा की हैं, और हमलों को रोका है और यह मांग की है कि हमलावरों को कानून के अनुरूप दंड मिले।’’ 

 

संबंधों में हाल ही में विस्तार: अमेरिका के ‘‘प्रमुख रक्षा भागीदार’’ के तौर पर भारत  

पिछले कुछ वर्षों में हमने अपने रक्षा और सुरक्षा सहयोग को और गहरा बनाया है जिससे कि बढ़ते खतरों से हमारे राष्ट्रों को सुरक्षित रख सकें, और अपनी सीमाओं से परे भी सुरक्षा मुहैया करा सकें। इस प्रयास को हमारे लीडरों की तरफ से मज़बूत समर्थन मिला है और यह स्पष्ट तौर पर हमारे आधिकारिक वक्तव्यों और रणनीतिक दस्तावेज़ों में प्रतिबिंबित होता है। वर्ष 2015 की अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति में भारत और अमेरिका-भारत सबंधों को दी जाने वाली बढ़ती प्राथमिकता को रेखांकित किया गया। इसमें संबंधों को सशक्त बनाने के अमेरिकी इरादे की पुष्टि की गई और क्षेत्रीय स्तर पर सुरक्षा उपलब्ध कराने को लेकर भारत की बढ़ती भूमिका का समर्थन किया गया।   

वर्ष 2016 में, अमेरिकी कांग्रेस ने भारत को ‘‘प्रमुख रक्षा भागीदार’’ के तौर पर मान्यता दी, जिससे ऐसा विशेष दज़र्ा पाने वाला यह अकेला देश बन गया। इस मान्यता का बहुत-से अमेरिकियों ने स्वागत किया और इसने संवदेनशील रक्षा प्रौद्योगिकी तक भारत की पहुंच का समर्थन किया और अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति में भारत की अहम भूमिका को और मज़बूत किया। वर्ष 2017 की अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति में ‘‘भारत के अग्रणी वैश्विक ताकत और मज़बूत सामरिक एवं रक्षा भागीदार के तौर पर उभरने’’ का स्वागत किया गया। इसमें हमारे बढ़ते संबंधों की महत्ता का स्पष्ट तौर पर जिक्र किया गया। वर्ष 2018 में अमेरिकी रक्षा विभाग ने हवाई में मौजूद अपनी क्षेत्रीय लड़ाकू कमान का नाम यू.एस. पैसेफिक कमांड से बदलकर यू.एस. इंडो-पैसेफिक कमांड कर दिया, जो हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की केंद्रीय भूमिका को दर्शाता है।

रक्षा संबंध सितंबर 2018 में नए स्तर पर पहुंच गए, जब 2प्लस2 मंत्री स्तर वार्ता की शुरुआत हुई। यह अमेरिका और भारत के रक्षा और विदेश नीति निर्धारकों के बीच कैबिनेट स्तर की बैठक है। यह महत्वपूर्ण कदम हमारे बढ़ते निकटवर्ती रक्षा संबंधों और क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर हमारे नज़रिये और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शांति और समृद्धता सुनिश्चित करने के लिए रक्षा गतिविधियों के समन्वय को लेकर हमारी संयुक्त प्रतिबद्धता को प्रतिबिंबित करता है। 2प्लस2 मंत्री स्तर वार्ता से हमारे संयुक्त प्रयासों के समन्वय और विस्तार के लिए फ्रेमवर्क भी उपलब्ध हुआ। हिंद-प्रशांत में भारत और अन्य महत्वपूर्ण भागीदारों के साथ इस घटनाक्रम के बाद, अमेरिकी रक्षा विभाग ने इस क्षेत्र पर अपनी पहली रिपोर्ट जारी की, जिसका शीर्षक था: ‘‘हिंद-प्रशांत रणनीतिक रिपोर्ट: तैयारी, भागीदारी और नेटवर्क वाले क्षेत्र को बढ़ावा।’’ इस रिपोर्ट ने क्षेत्र में हमारे साझा हितों को आगे बढ़ाने के लिए अमेरिका-भारत भागीदारी की महत्ता पर बल दिया। 

 

नीति परामर्श और अंतरसंचालन क्षमता समझौते से सुरक्षा को बढ़ावा 

अमेरिका-भारत में बढ़ते रक्षा संबंधी परामर्श और नए सुरक्षा समझौते हमारे लोगों को सुरक्षित रखने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है। इससे हम आज के विश्व में बदलते खतरों के बारे में आकलन कर पा रहे हैं, अपनी गतिविधियों की योजना और अपने संसाधनों का आवंटन बेहतर तरीके से कर पा रहे हैं और अपनी अंतरसंचालन क्षमता बढ़ा पा रहे हैं। हमारा असैन्य और सैन्य शीर्ष रक्षा नेतृत्व इन प्रयासों में अग्रणी रहा है। इसमें अमेरिका के रक्षा मंत्री और भारत के रक्षा मंत्री की एक-दूसरे के देशों की नियमित तौर पर यात्राएं भी शामिल हैं।   

इस तरह की वार्ताओं से 2002 के सैन्य सूचनाओं की सामान्य सुरक्षा से जुड़ा समझौता (जीएसओएमआईए) संपन्न हुआ, जिससे कि संवेदनशील सैन्य जानकारियों की सुरक्षा की जा सके। उसी साल हमने भारत के फायरफाइंडर रेडार प्लेटफार्म खरीदने की सहमति के साथ द्विपद्वाय रक्षा सामान की बिक्री भी फिर से शुरू की। वर्ष 2019 में हमने जीएसओएमआईए के संलग्नक के तौर पर इंडस्ट्रियल सिक्योरिटी एनेक्स पर हस्ताक्षर किए, जिससे कि हमारी निजी कंपनियां तकनीकी रूप से उन्नत रक्षा प्रणालियों का मिलकर साथ-साथ विकास और उत्पादन कर सकें। इससे संवेदनशील सरकारी सूचनाओं को प्राइवेट इंडस्ट्री के साथ साझा करना संभव हो पाया, जिससे हमारी सुरक्षा और अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिला।   

जब अमेरिका और भारत के सैन्य बल अधिक बार साथ-साथ प्रशिक्षण और अभ्यास करने लगे तो यह साफ हो गया कि हमें ईंधन और अन्य चीज़ों के शीघ्रता से आदान-प्रदान करने की व्यवस्था बनाने की ज़रूरत है और साथ ही, ज़िम्मेदारी भी सुनिश्चित करनी है। इसलिए हमने वर्ष 2016 में लॉजिस्टिक्स एक्सचेंज मेमोरंडम ऑफ़ एग्रीमेंट (लेमोआ) पर हस्ताक्षर किए। इससे हम आने वाले विमानों और जहाजों में ईंधन भरने समेत अपनी अंतरसंचालन क्षमता बढ़ा पाए हैं। वर्ष 2017 में विमानवाहक पोतों से अलग जहाजों से हेलिकॉप्टर संचालन के बारे में एक समझौते (हॉस्टैक) पर हस्ताक्षर किए, जिससे कि हमारे हेलिकॉप्टर एक-दूसरे के जहाजों से संचालित हो सकें। और हमारे द्वारा साथ-साथ ज्यादा अभ्यास और संचालन के मद्देनज़र हमारी यूनिटों को ऐसी प्रणाली और उपकरणों की आवश्यकता है जिससे कि सुरक्षित तरीके से बिना मुख्यालय के जरिये बिना समय गंवाए संवाद हो सके। इसलिए हमने वर्ष 2018 में कम्युनिकेशंस कॉम्पैक्टिबिलिटी सिक्योरिटी एग्रीमेंट (कॉमकासा) पर हस्ताक्षर किए, जिससे संचार सुरक्षा प्रणालियों और प्रोटोकॉल को हम साझा कर सकते हैं। नई दिल्ली में वर्ष 2020 में 2प्लस2 मंत्री स्तर वार्ता के दौरान हुए समझौतों में विस्तारित अमेरिका-भारत रक्षा सहयोग की बात सबसे आगे थी। इस वार्ता के दौरान अमेरिका और भारत ने बेसिक एक्सचेंज एंड कोऑपरेशन एग्रीमेंट (बेका) पर हस्ताक्षर किए जिससे कि हमारे सुरक्षा बल भूस्थानिक सूचनाओं को ज्यादा साझा कर सकें।  

 

सैन्य अभ्यासों के माध्यम से सुरक्षा को बढ़ावा  

शीर्ष स्तर पर इस नीति निर्देशन और समझौतों के फ्रेमवर्क ने अमेरिका और भारत सैन्य अभ्यास और संयुक्त प्रशिक्षण की बारंबरता, दायरा और गहनता बढ़ाने में मदद की है। हमारी नौसेनाओं, थल सेनाओं और वायु सेनाओं ने एक-दूसरे के साथ अभ्यास कर अपनी अंतर संचालन क्षमता में बढ़ोतरी की है। अमेरिका और भारत की नौसेनाओं ने मालाबार अभ्यास का दायरा बढ़ाया, जो हिंद और प्रशांत महासागरों के बीच चालित है, और इसमें जापान मैरीटाइम सेल्फ-डिफेंस फ़ोर्स को शामिल किया और वर्ष 2020 में फिर से विस्तार कर इसमें आस्ट्रेलिया को शामिल किया गया। मल्टीनेशनल रिम ऑफ़ द पैसेफिक एक्सरसाइज या रिमपैक में अमेरिका और अन्य हिंद-प्रशांत देशों के साथ भारतीय नौसेना नियमित भागीदार है।   

अमेरिका और भारत की सेना ने अपने मुख्य सैन्य अभ्यास युद्ध अभ्यास का विस्तार किया है जो संयुक्त राष्ट्र शांति सेना परिदृश्य  ेके मुताबिक सालाना अपनी अंतरसंचालन क्षमता बढ़ाती है। अमेरिका और भारत की वायु सेनाओं ने इसी तरह कोप इंडिया के ज़रिये अपना सहयोग सशक्त बनाया है, जो भारत में होने वाला द्विवार्षिक अभ्यास है और जिससे आदान-प्रदान और सहयोग के स्तर में वृद्धि हुई है। भारतीय वायु सेना अमेरिकी वायु सेना के प्रीमियर वार गेम, रेड ़फ्लैग-अलास्का में भी नियमित भागीदार है। अमेरिका और भारत के विशेष कार्रवाई बलों ने भी तरकश और वज्र प्रहार अभ्यासों समेत अपना गठजोड़ बढ़ाया है। इनसे आतंकवादी खतरों के खिलाफ संयुक्त कार्रवाई समेत विषम परिस्थितियों में काम करने के लिए अंतरसंचालन क्षमता विकसित हुई है। 

हमारे विशिष्ट सेवा गठबंधनों से बनी साथ-साथ काम करने की क्षमता को और आगे बढाते हुए और हमारे सुरक्षा बलों को वास्तव में अंतरसंचालन क्षमता प्रदान करने के लिए हमने पहली बार आंध्र प्रदेश के तट पर नवंबर 2019 में तीनों सेनाओं का अभ्यास टाइगर ट्रायम्फ आयोजित किया। इस अभ्यास में हमारी थल सेना, नौसेना ओर वायु सेना ने जल-थल में उतरने और मानवीय मदद मुहैया कराने की अपनी क्षमता को परखा और इस अभ्यास के भविष्य में हर साल होने की उम्मीद है। 

इन रक्षा समझौतों ओर सैन्य अभ्यास के परिणामस्वरूप, हमारे सुरक्षा बल हिंद-प्रशांत को स्वतंत्र और मुक्त बनाए रखने के लिए मिलकर ज्यादा प्रभावी तरीके से काम कर रहे हैं। अमेरिका और भारत की नौसेनाएं बिना रुके पानी के अंदर आपूर्ति का काम संचालित करती है, संचालन से जुड़ी जानकारियों को साझा करती हैं और हिंद महासागर में संचालन के माहौल की साझा समझ सुनिश्चित करने के लिए इस बारे में जागरूकता में भागीदारी करती हैं। दिसंबर 2018 में भारतीय नौसेना का एक हेलिकॉप्टर यूएच-3एच अमेरिकी नौसेना के परिवहन जहाज, यूएसएस एंकरेज पर उतरा। यूएसएस एंकरेज भारतीय गाइडेड मिसाइल डेस्ट्रॉयर आईएनएस राजपूत के साथ समुद्री सुरक्षा अभ्यास में भी शामिल हुआ।   

 

प्रशिक्षण, आदान-प्रदान और संपर्क अधिकारियों के माध्यम से सुरक्षा को बढ़ावा  

हमने यह सुनिश्चित करने का प्रयास भी किया है कि हमारे सैन्य बल एक-दूसरे से परिचित रहें और मानवीय स्तर पर अंतरसंचालन के योग्य हों। हमने आदान-प्रदान में बढ़ोतरी कर, संयुक्त प्रशिक्षण और संपर्क अधिकारियों की तैनाती कर ऐसा किया है। कई सालों तक भारत ने नई दिल्ली स्थित अपने नेशनल डिफेंस कॉलेज और वेलिंगटन, तमिलनाडु स्थित डिफेंस सर्विसेज स्टाफ कोर्स में अमेरिकी सैन्य विद्यार्थियों की मेज़बानी की है। अमेरिका अंतरराष्ट्रीय सैन्य शिक्षा और प्रशिक्षण कार्यक्रम के माध्यम से प्रति वर्ष अपने प्रमुख सैन्य शिक्षण संस्थानों में नौ भारतीय अधिकारियों की मेज़बानी करता है। वर्ष 2010 से अब तक भारत के 700 सैन्य विद्यार्थी अमेरिका में प्रशिक्षण ले चुके हैं।   

सैन्य विद्यार्थियों के शैक्षणिक आदान-प्रदान के अलावा हमने एक-दूसरे की सैन्य सुविधाओं में संपर्क अधिकारियों की तैनाती पर भी गौर करना शुरू किया है। ऐसी तैनातियां एक-दूसरे की विशेषज्ञता के प्रति परस्पर सम्मान और विश्वास के उच्च स्तर को प्रदर्शित करती हैं। अमेरिका ने इसलिए  इस तरह की पहल सिर्फ निकटवर्ती सहयोगियों और भागीदारों के साथ की है। वर्ष 2020 में पहली बार अमेरिका ने किसी भारतीय सैन्य सुविधा में अपने अधिकारी की तैनाती की, जो गुरुग्राम, हरियाणा में नए स्थापित इनफ़ॉर्मेशन ़फ्यूजन सेंटर- इंडियन ओशन रीज़न में एक अमेरिकी नौसेना अधिकारी की तैनाती के रूप में सामने आई। इसी तरह भारत ने भी पहली बार किसी अमेरिकी कमांड में अपने अधिकारी की तैनाती की, जो मनामा, बहरीन में अमेरिकी नौसेना के सेंट्रल कमांड में एक नौसेना अधिकारी के तौर पर थी।   

 

रक्षा प्रौद्योगिकी और औद्योगिक सहयोग के माध्यम से अर्थव्यवस्थाओं को मज़बूती 

हाल के वर्षों में अमेरिका और भारत ने रक्षा औद्योगिक सहयोग का काफी विस्तार किया है और यह सुनिश्चित करने में मदद की है कि हमारे पास अपने देशों को सुरक्षित रखने के लिए सही उपकरण और मंच हों। अमेरिकी सरकार और रक्षा उद्योग ने भारत के साथ संयुक्त शोध, उत्पादन और रक्षा बिक्री को बढ़ाया है। भारत की रक्षा क्षमता और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में उसकी सुरक्षा की भूमिका को सशक्त करने के लिए यह अमेरिकी प्रतिबद्धता को प्रतिबिंबित करता है। अमेरिका रक्षा प्रौद्योगिकी और ज्ञान को भी अधिक साझा कर रहा है। भारत द्वारा अमेरिका और अन्य पश्चिमी भागीदारों से लिए रक्षा सामान का इस्तेमाल करने से ने सिर्फ दुनिया के सर्वश्रेष्ठ रक्षा सामान के कारण भारत सैन्य दृष्टि से मज़बूत हुआ है, बल्कि इससे संवाद और संयुक्त रूप से काम करने की हमारी क्षमता भी बढ़ी है।

भारतीय वायु सेना अब 11 सी-17 ग्लोबमास्टर एयरक्रा़फ्ट का संचालन करती है, जो अमेरिका के बाहर सबसे बड़ी संख्या है। इन बड़े विमानों से भारत कई तरह के सैन्य और मानवीय अभियानों के लिए सुरक्षित तरीके से लोगों और उपकरणों को भेज सकता है। अप्रैल 2015 में भारतीय वायु सेना ने यमन में अशांति के कारण वहां से भाग रहे लोगों को सुरक्षित निकालने के लिए तीन सी-17 विमानों का इस्तेमाल किया। ये विमान ऑपरेशन राहत का हिस्सा थे, जो क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभाने की भारत की योग्यता का प्रभावी प्रदर्शन था। भारतीय विमान और जहाज 4600 भारतीय नागरिकों और अमेरिका और अन्य देशों के लगभग 1000 विदेशी नागरिकों को वहां से बचाकर लाए।   

इसी तरह भारतीस नौसेना अमेरिका के अलावा पी-8 पॉसायडन विमानों की सबसे बड़ी संचालक है। इन विमानों में पनडुब्बी युद्ध, ज़मीनी युद्ध और नौपरिवहन पर रोक की परिस्थितियों में काम करने की खासियत है। अन्य हिंद-प्रशांत देश, जैसे आस्ट्रेलिया, दक्षिण कोरिया और न्यूजीलैंड भी या तो इन विमानों का संचालन कर रहे हैं या फिर पी-8 के इस्तेमाल की योजना बना रहे हैं, ताकि क्षेत्र में अधिक समुद्री समन्वय सुनिश्चित किया जा सके। भारतीय सेना ने हाल के वर्षों में अमेरिकी मूल के कई अन्य प्लेटफ़ॉर्म अपने बेड़े में शामिल किए हैं। इनमें सी-130जे हरक्यूलिस परिवहन विमान, एएच-64ई अपाचे और सीएच-47 चिनूक हमलावर और परिवहन हेलिकॉप्टर और बहुत ही कम वज़न की होवाइत्ज़र तोपें एम777 शामिल हैं।   

रक्षा औद्योगिक गठजोड़ में विस्तार से अमेरिकी रक्षा उद्योग में वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं के लिए भारतीय उपक्रमों के साथ भागीदारी कर कलपुर्जों का विकास और उत्पादन करने का सामर्थ्य बना है। बोइंग, लॉकहीड मार्टिन, बीएई, रेथियॉन टेक्नोलॉजीज, जनरल इलेक्ट्रिक, और एल3हैरिस समेत बहुत-सी बड़ी अमेरिकी रक्षा कंपनियों की अब भारत में मौजूदगी है। उनकी गतिविधियों में शोध सुविधाएं और बड़े पैमाने पर उत्पादन शामिल हैं और उनके भागीदारों में लघु, मझोली और बड़ी भारतीय कंपनियां शामिल हैं। भारत में शीघ्र ही बोइंग की अमेरिका से बाहर सबसे बड़ी मौजूदगी होगी। इसमें बेंगलुरु में स्थित सुविधा में सैंकड़ों भारतीय इंजीनियर काम करेंगे। बोइंग और लॉकहीड मार्टिन, दोनों के ही हैदराबाद में असेम्बली प्लांट हैं जिनमें अपाचे हेलिकॉप्टर के फ्यूजलाज़, सी-130 के एमपेनेज और एफ़-16 के विंग बनते हैं।   

रक्षा भागीदारी की बढ़ती मज़बूती और विश्वास के मद्देज़र अमेरिका ने भारत के लिए निर्यात नियंत्रण शिथिल कर दिए हैं। इनमें वर्ष 2018 में भारत को रणनीतिक व्यापार स्वीकृति की श्रेणी-1 (एसटीए-1) में रखा गया। इससे भारत की विश्व की सबसे आधुनिकतम रक्षा तकनीक तक पहुंच बढ़ गई। इस तकनीक से न सिर्फ भारतीय सशस्त्र सेना सशक्त हुई है, बल्कि इसके वैज्ञानिक समुदाय और प्राइवेट इंडस्ट्री को भी शक्ति मिली है।   

चार बहुपक्षीय निर्यात नियंत्रण व्यवस्थाओं में भारतीय सदस्यता का समर्थन करने के लिए अमेरिका ने अन्य देशों को प्रोत्साहित करने के लिए महत्वपूर्ण राजनयिक प्रयास किए हैं। भारत इनमें से तीन में शामिल हो चुका है- जून 2016 में मिसाइल तकनीक नियंत्रण व्यवस्था, दिसंबर 2017 में वासेनार व्यवस्था (दोहरे इस्तेमाल का सामान और तकनीक) और जनवरी 2018 में आस्ट्रेलिया ग्रुप (रसायनिक और जैविक हथियार)- और न्यूक्लिर सप्लायर्स ग्रुप की सदस्यता का आग्रह बरकरार है। इसके परिणामस्वरूप अब भारत की विश्व की ज्यादातर आधुनिकतम तकनीकों तक पहुंच है और अप्रसार व्यवस्था के लिए वैश्विक नियंत्रण बनाने और उन पर अमल कराने का सामर्थ्य भी।   

 

आतंकवाद से मुकाबले में गहन सहयोग 

अमेरिका-भारत की मज़बूत होती भागीदारी ने आतंकवाद के खिलाफ मुकाबले में बढ़ते सहयोग के जरिये हमारे देशों और हमारे क्षेत्र की की सुरक्षा और को सशक्त बनाया है। लगातार होते हमलों के मद्देनज़र हम साथ-साथ खड़े रहे हैं, विविध और सहिष्णु लोकतांत्रिक समाजों के तौर पर हम अपनी लोचशक्ति के प्रदर्शन के लिए प्रतिबद्ध हैं। पिछले हमलों के लिए न्याय पाना और भविष्य केआतंकवादी हमलों को रोकने के लिए हमने संयुक्त प्रयासों को भी प्राथमिकता दी है।   

अमेरिका और भारत ने नियमित तौर पर आतंकवाद के मसले पर उच्चतम स्तर पर चर्चा की है और प्रधानमंत्री मोदी की राष्ट्रपति ओबामा और राष्ट्रपति ट्रंप के साथ बैठकों के बाद संयुक्त वक्तव्यों में आतंकवाद पर सशक्त घोषणाएं इसे दर्शाते हैं। हमने सूचनाओं को साझा करने और विश्लेषणों की तुलना करने के काम को विस्तार दिया है और क्षेत्रीय और वैश्विक आतंकवादी खतरों के खिलाफ कार्रवाई में समन्वय बनाया है। अन्य सरकारी एजेंसियों की मदद के साथ अमेरिकी विदेश विभाग और भारत के विदेश मंत्रालय के नेतृत्व में काउंटरटेरेरिज्म ज्वाइंट वर्किंग ग्रुप (सीटीजेडब्ल्यूजी) की वर्ष 2000 से अब तक 17 बैठकें हो चुकी हैं। हमने वर्ष 2018 में नाम चिह्नित करने संबंधी अमेरिका-भारत वार्ता शुरू की, जिससे कि वैयक्तिक स्तर पर आतंकवादियों और समूहों को चिह्नित करने के हमारे दृष्टिकोण में समन्वय हो सके। 

अमेरिका के विदेश विभाग ने भारत के गृह मंत्रालय के साथ भागीदारी की है जिससे कि भारत की भोपाल स्थित केंद्रीय पुलिस प्रशिक्षण अकादमी, गाजियाबाद स्थित केंद्रीय जासूसी प्रशिक्षण संस्थान, और हैदराबाद स्थित राष्ट्रीय पुलिस अकादमी में आतंकवाद से मुकाबले के प्रशिक्षण को सशक्त बनाया जा सके। विदेश विभाग ने आतंकवाद से मुकाबले में सहायता के प्रोग्राम के जरिये मदद की है, जिसमें 1,000 भारतीय कर्मियों के लिए उपकरण और प्रशिक्षण शामिल हैं। समान विचारों वाले देशों में आतंकवाद के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय सहयोग के विस्तार की महत्ता को पहचानते हुए भारत ने द्विपक्षीय प्रशिक्षण प्रयासों को व्यापक करने में मदद की है और इसके लिए नवंबर 2019 में क्वाड काउंटरटेरेरिज्म टेबल-टॉप एक्सरसाइज़ की मेज़बानी की। 

फेडेरल ब्यूरो ऑफ़ इनवेस्टीगेशन (एफबीआई) ने 26/11 के मुंबई आतंकवादी हमलों के शिकार लोगों को न्याय दिलाने के लिए भारतीय भागीदारों के साथ काम जारी रखा है। अक्टूबर 2018 में एफबीआई और अमेरिकी विदेश विभाग ने मुंबई हमलों के कथित मुख्य योजनाकार साजिद मीर की गिऱफ्तारी और सजा के लिए सूचना हासिल करने को जस्टिस प्रोग्राम के तहत 50 लाख डॉलर का पुरस्कार तय किया। हाल के वर्षों में एफबीआई निदेशक और अन्य शीर्ष अधिकारियों ने भारतीय समकक्षों के साथ नियमित मुलाकातें की हैं। एफबीआई ने भारतीय भागीदारों के साथ मिलकर भारत में 15 से अधिक प्रशिक्षण कार्यक्रम प्रस्तुत किए हैं। इसमें विस्फोट पश्चात कार्रवाई, आतंकवाद वित्तपोषण जांच, संकट प्रबंधन और साइबर जांच जैसे विषयों पर सर्वश्रेष्ठ परिपाटियों का आदान-प्रदान किया गया है।   

 

नशीले पदार्थों और साइबर अपराध के खतरे का मुकाबला 

अमेरिका और भारत ने अवैध नशीले पदार्थों और द्वेषपूर्ण साइबर गतिविधियों समेत कई तरह की आपराधिक गतिविधियों से मुकाबले में सहयोग का विस्तार किया है। इन प्रयासों को उच्चतम स्तर से समर्थन मिला है। फ़रवरी 2020 में राष्ट्रपति ट्रंप और प्रधानमंत्री मोदी ने हमारे देशों की कानून प्रवर्तन एजेंसियों के बीच नए काउंट-नारकोटिक्स वर्किंग ग्रुप बनाने की घोषणा की, जिससे कि अवैध मादक पदार्थों से मुकाबले में हमारे लंबे समय से चल रहे सहयोग को और गति मिले।   

निकटवर्ती भागीदारी से हमारी कानून प्रवर्तन एजेंसियों के बीच नीतिगत चर्चाओं और प्रशिक्षण में बढ़ोतरी हुई है। उदाहरण के तौर पर, यू.एस. ड्रग एनफॉर्समेंट एजेंसी (डीईए) ने फेंटानिल जैसी सिंथेटिक ड्रग के व्यापार की रोकथाम के लिए भारत के नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (एनसीबी) से सर्वश्रेष्ठ परिपाटियों का आदान-प्रदान किया है। अमेरिकी विदेश विभाग के ब्यरो ऑफ़ नारकोटिक्स एंड लॉ एनफ़ोर्समेंट ने भारतीय समकक्षों और अन्य दक्षिण एशियाई देशों के अधिकारियों के बहुवर्षीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का समर्थन किया है।  

अवैध मादक पदार्थों के विरुद्ध हमारे द्विपक्षीय सहयोग से ठोस सफलता मिली है। भारत के राजस्व गुप्तचर निदेशालय (डीआरआई) और एनसीबी के साथ मिलकर डीईए ने दुनिया के कई देशों से ट्रामाडोल, वैश्विक ओपियॉड समस्या का भाग, की अरबों अवैध खुराक जब्त की हैं। डीईए, डीआरआई और एनसीबी ने नियामकों के साथ सफलतापूर्वक काम करते हुए वर्ष 2018 में ट्रामाडोल पर नियंत्रण के बारे में ताज़ा जानकारी ली, जिससे इस मादक पदार्थ के दुरुपयोग में भारी कमी आई। डीईए और अन्य अमेरिकी कानून प्रवर्तन भागीदारों ने एनसीबी और भारतीय नौसेना के इनफ़ॉर्मेशन फ्यूजन सेंटर सहित भारतीय शासन के साथ सफलतापूर्वक कार्रवाइयां की हैं और समुद्री रास्ते से हेरोइन और अन्य अवैध मादक पदार्थों की तस्करी को निशाना बनाया है। वर्ष 2019 में डीईए और एनसीबी ने एक ड्रग तस्करी संगठन की जांच के लिए संयुक्त अभियान का नेतृत्व किया। इस संगठन के संबंध अमेरिका, कनाडा, आस्ट्रेलिया और दक्षिण अमेरिका के अन्य देशों में भी थे। इस जांच में 200 किलोग्राम मेथामफेटमिन और 70 किलोग्राम कोकेन जब्त की।  

साइबर अपराध, चाहे विदेशी सरकारों द्वारा हो या अपराधियों के द्वारा, अमेरिका, भारत आस्द्भ विश्व के लिए एक और बढ़ता खतरा है। अमेरिका और भारत ने पर्सनल यूजर डेटा, इंडस्ट्रियल डिज़ाइन, महत्वपूर्ण इन्फ्रास्ट्रक्चर और आधुनिक समाजों के लिए अहम अन्य प्रणालियों की सुरक्षा के लिए मिलकर काम किया है। यह सहयोग प्रतिदिन सूचनाएं साझा करने से लेकर योजनाबद्ध वार्ताओं में नीति समन्वय तक का है।  

अमेरिका-भारत साइबर वार्ता के ज़रिये अमेरिका और भारत ने हमारे कंप्यूटर इमरजेंसी रिस्पॉंस टीम (सीईआरटी) सहयोग को सशक्त किया है और मालवेयर फारेंसिक, महत्वपूर्ण इन्फ्रास्ट्रक्चर की सुरक्षा और भ्रामक सूचनाओं से निपटने के लिए सर्वश्रेष्ठ तरीकों का आदान-प्रदान किया है। वर्ष 2020 में पहली साइबर रक्षा वार्ता के दौरान अमेरिका और भारत ने सर्वश्रेष्ठ तरीकों के आदान-प्रदान और साइबर क्षमता निर्माण के प्रयास के लिए वर्किंग ग्रुप स्थापित किए। 

 

भविष्य पर नज़र 

रक्षा और सुरक्षा मामलों में हमारी हाल की प्रगति, जो बहुत-से वर्षों के इतिहास पर निर्मित है, ने हमारे नागरिकों और हिंद-प्रशांत की सुरक्षा में योगदान दिया है। सहयोग की आदत, निजी संबंध, विशेषज्ञता, और हमारे द्वारा विकसित उपकरणों ने हमें भविष्य के खतरों और चुनौतियों से निपटने के लिए भी तैयार किया है। हिंन्द-प्रशांत और वास्तव में पूरी दुनिया में अग्रणी लोकतंत्र होने के नाते, हम यह सुनिश्चित करने के लिए तैयार हैं कि सभी राष्ट्रों और लोगों को नियम आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में प्रगति करने का अवसर मिले। 

 


टाइगर ट्रायम्फ

अमेरिका के साथ पहली बार तिहरे सैन्य अभ्यास में भारतीय सेना के तीनों अंगों ने अमेरिकी थल सेना, नौसेना, वायु सेना और मरीन कॉर के साथ वर्ष 2019 में युद्धाभ्यास किया। इस अभ्यास को टाइगर ट्रायम्फ नाम दिया गया।  यह अमेरिकी और भारतीय सेना के बीच चलती आ रही भागीदारी का हिस्सा है और हिंद-प्रशांत की सुरक्षा का महत्वपूर्ण घटक है।  

13 से 21 नवंबर तक चले अभ्यास के बारे में भारत में अमेरिकी राजदूत केनेथ जस्टर का कहना है, ‘‘अमेरिका-भारत भागीदारी समुद्री गलियारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा बढ़ाने की दृष्टि से अहम है।’’ उन्होंने कहा, ‘‘अमेरिका-भारत रक्षा भागीदारी बहुत मज़बूत है और यह और भी मज़बूत हो रही है।’’ 

टाइगर ट्रायम्फ ने मानवीय सहायता और आपदा राहत पर ध्यान केंद्रित कियाऔर इसमें जल-थल दोनों से जुड़ी गतिविधियां थीं। इसमें ‘‘ट्रायम्फ’’ नाम ट्राइ सर्विसेज़ इंडिया यू.एस. एम्फिबियस एक्सरसाइज़ के लिए है। 

अमेरिका के विदेश मंत्री माइकल आर. पॉम्पियो ने वर्ष 2020 में तीसरी 2प्लस2 मंत्री स्तरीय वार्ता के अवसर पर संवाददाता सम्मेलन में कहा, ‘‘अपनी संप्रभुता और स्वतंत्रता की चुनौतियों से मुकाबले में अमेरिका भारत के लोगों का साथ देगा।’’ उन्होंने कहा, ‘‘अमेरिका और भारत किसी भी तरह की चुनौती से निपटने के लिए सहयोग सशक्त करने के लिए कदम उठा रहे हैं।’’ 

 

अपराधियों को सजा दिलाना

भारत दक्षिण एशिया में महत्वपूर्ण कानून प्रवर्तन भागीदार है। एफबीआई का नई दिल्ली में मौजूद कानून अताशे कार्यालय भारत की सुरक्षा एजेंसियों के साथ बहुत-से मुद्दों पर करीबी गठजोड़ करता है। इनमें आतंकवाद, साइबर अपराध, कई देशों में फैले संगठित अपराध और बाल यौन अपराधों की रोकथाम शामिल है। एफबीआई की भारतीय समकक्षों के साथ निकट की भागीदारी के परिणामस्वरूप जांच से जुड़े आदान-प्रदान और क्षमता निर्माण कार्यक्रमों से आतंकवादी हमलों और आपराधिक गतिविधियों को अवरुद्ध करने में कामयाबी मिली है। 

एफबीआई और भारतीय कानून प्रवर्तन एजेंसियों ने पूरे भारत में फर्जी कॉल सेंटरों द्वारा की जा रही आपराधिक गतिविधियों को रोकने के लिए साथ-साथ काम किया है। फर्जी कॉल सेंटर बुजुर्ग अमेरिकियों को निशाना बनाते हैं, जिससे करोड़ों डॉलर का नुकसान होता है। अपराधी जालसाजी के लिए तकनीकी तरीका अपनाते हैं या फिर अमेरिकी या भारतीय कानून प्रवर्तन अधिकारी होने का झांसा देते हैं। उदाहरण के तौर पर, वर्ष 2018 में ही, भारत के केंद्रीय और राज्य स्तर के कानून प्रवर्तन अधिकारियों ने एफबीआई के साथ काम करते हुए गुरुग्राम, हरियाणा और नोएडा, उत्तर प्रदेश में 60 फर्जी कॉल सेंटरों पर छापेमारी और गिऱफ्तारी की कार्रवाई की। एफबीआई और भारतीय कानून प्रवर्तन भागीदार ऐसी किसी भी आपराधिक गतिविधि को रोकने को प्रतिबद्ध हैं जिससे अमेरिका और भारत, दोनों प्रभावित होते हैं।