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खामोश न रहें

महिलाओं के खिलाफ हिंसा को रोकने के लिए सामुदायिक प्रयास महत्वपूर्ण।


जब हम महिलाओं के खिलाफ हिंसा के बारे में सोचते हैं तो हम अक्सर पीडि़तों और हमलावरों के बारे में सोचते हैं। किसी विशेष मामले में ऐसा सोचना सही हो सकता है लेकिन लैंगिक हिंसा से व्यापक स्तर पर मुकाबले के लिए- ऐसी बुराई जो सीमाओं से परे है और सभी संस्कृतियों में मौजूद है- तो हमें पूरे समुदाय पर नज़र डालनी होगी।

महिलाओं को शक्ति, हिंसा की रोकथाम

SLAP conducts self-defense workshops for girls and women of all ages and professions. Photograph courtesy SLAP

भारत और दुनिया भर के अनेक लोगों की तरह ही मृगांका डडवाल को भी 2012 में नई दिल्ली में हुए ‘‘निर्भया’’ बलात्कार मामले से गहरा झटका लगा था। लेकिन दूसरों के विपरीत, उन्होंने एक नई पहल के माध्यम से भारतीय महिलाओं की रक्षा और उन्हें सशक्त बनाने के लिए एक कार्यक्रम शुरू करने का निर्णय लिया- गली-मोहल्ले के स्तर पर जागरूकता कार्यक्रम या स्ट्रीट लेवल अवेयरनेस प्रोग्राम यानी स्लैप।

डडवाल कहती हैं, ‘‘हम कैंडल मार्च और फेसबुक गतिविधि से परे जाना चाहते थे और महिलाओं के बलात्कार, हमले और सार्वजनिक उत्पीड़न से आहत अपने शहर की छवि को बदलने के लिए कुछ व्यावहारिक करना चाहते थे।’’ वह अमेरिकी विदेश विभाग के इंटरनेशनल विजिटर्स लीडरशिप प्रोग्राम की भागीदार रही हैं। लैंगिक हिंसा की रोकथाम के विषय से जुड़े कार्यक्रम के सिलसिले में वह मार्च 2014 में अमेरिका गई थीं।

 2013 में अपनी स्थापना के बाद से, स्लैप ने नई दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और चेन्नई सरीखे विभिन्न शहरों में - व्यापारिक पेशेवरों से लेकर कॉलेज के छात्रों और गृहिणियों तक के लिए दज़र्नों कार्यशालाएं आयोजित की हैं।

डडवाल स्कूलों, कालेजों और छोटे समुदायों में स्लैप क्लब की स्थापना के जरिए इस कार्यक्रम की पहुंच का विस्तार करने की योजना भी बना रही हैं।

स्लैप के पास स्वयंसेवकों की एक बड़ी तादाद के साथ ही तीन आत्मरक्षा प्रशिक्षक और एक परामर्शदाता हैं। डडवाल कहती हैं कि शुरुआत में, स्लैप ने सौ या अधिक प्रतिभागियों के साथ खुली कार्यशालाओं का आयोजन किया, जिससे लोगों में जागरुकता बढ़ाने में मदद मिली, लेकिन इसमें महिलाओं को होने वाला लाभ सीमित था। इसलिए हमने 25 से 30 की संख्या वाले छोटे समूहों की भागीदारी को चुना, जहां हर किसी पर व्यक्तिगत तौर पर ध्यान दिया जा सकता है।’’

स्लैप महिलाओं को शारीरिक और मानसिक दोनों तरह से सशक्त बनाने के लिए प्रयासरत है। डडवाल उन महिलाओं का उदाहरण देती हैं, जिन्होंने सार्वजनिक परिवहन में छेड़खानी और अशिष्ट ताने सहे थे, लेकिन विरोध करने से डरती थीं।

डडवाल कहती हैं, ‘‘कार्यशाला में हम इस तरह की स्थितियों को खुले तौर पर उनके सामने रखते हैं और उन्हें जब अन्य महिलाओं से समर्थन मिलता है तो वे इस आत्मविश्वास के साथ जाती हैं कि अगली बार ऐसा होने पर वह कदम उठाएंगी। इससे भी अच्छी बातें होती हैं जब पुरुष अचानक खड़े हो जाते हैं और कहते हैं कि उन्हें खेद है या शर्म आती है कि यह उनके शहर में हुआ है।’’

डडवाल और स्लैप प्रशिक्षक, प्रत्येक प्रतिभागी में जरूरी उपायों की एक जांच -सूची ( चेकलिस्ट ) वितरित कर अपने प्रशिक्षण को प्रभावी बनाने का एक बहुत ही व्यवहारिक दृष्टिकोण अपनाते हैं:

  • क्या आपके मोबाइल के स्पीड डायल में आपातकालीन संपर्क हैं?
  • क्या आपने अपने मोबाइल में आपातकालीन, जीवन-रक्षक एप को डाउनलोड किया है?
  •  क्या आप काली मिर्च-स्प्रे लेकर चलती हैं?
  •  क्या आपने बुनियादी आत्मरक्षा करना सीखा है?
  •  जब आप अपने आप को मुसीबत में पाते हैं तो क्या आपके पास उसके लिए कोई योजना है?

डडवाल का कहना है, ‘‘हम इस मानसिकता को तोड़ने में सफल हुए हैं कि ये बातें दूसरी महिलाओं के साथ होती हैं, मेरे साथ नहीं।’’

‘‘लेकिन अभी भी बहुत सी महिलाओं के लिए उस अहसास पर अमल करना मुश्किल है।’’
-हॉवर्ड सिनकोटा

लैंगिक हिंसा से निपटने के लिए यूनिवर्सिटी ऑ़फ न्यू हैम्पशायर में चल रहे नवप्रेरित कार्यक्रम के पीछे यही मूल सोच है। इस कार्यक्रम ने पूरे अमेरिका में लोगों का ध्यान खींचा है। यह कार्यक्रम पास खड़े लोगों को इस मामले में शामिल करने का आह्वान करता है और इसके साथ ही सोशल मार्केटिंग अभियान ‘‘नो योर पॉवर’’ भी चलाया जा रहा है।

पास खड़े दर्शक
यूनिवर्सिटी ऑ़फ न्यू हैम्पशायर में वर्ष 2006 में शुरू शोध, प्रशिक्षण एवं समर्थन संगठन प्रवेंशंस इनोवेशंस ने ऐसा प्रोग्राम तैयार किया जिसमें पास खड़े दर्शकों को शामिल किया गया। जेन स्टेपलटन इसकी सह-निदेशक हैं। वर्ष 1987 में परिसर में सामूहिक बलात्कार के मामले के बाद वह लैंगिक मसलों से जुड़ी। इस मामले में अपराधियों को मामूली सजा मिली, पीडि़त ने संस्थान छोड़ दिया और लापता हो गई।

स्टेपलटन याद करती हैं, ‘‘वह समय बहुत अलग था। उस समय डेट रेप या परिचितों द्वारा बलात्कार जैसे शब्द भी नहीं थे। मैने अपने ग्रेजुएट अध्ययन का विषय बदला और लैंगिक बराबरी और हिंसा के मुद्दों पर ध्यान दिया।’’

आज, स्टेपलटन का काम उनके इन्हीं अनुभवों और लैंगिक हिंसा के कारण और रोकथाम पर उनके सालों के गहन शोध पर आधारित है।

स्टेपलटन कहती हैं, ‘‘यह क्षेत्र अब सिर्फ महिलाओं से सुरक्षित रहने के तौरतरीकों के बारे में बात करने और पुरुषों को बलात्कार न करने के लिए कहने तक सीमित नहीं रहा। पास खड़े दर्शकों का हस्तक्षेप करना अलग चीज़ है। महिलाओं तक हम संभावित पीडि़ता और पुरुषों तक संभावित हमलावर के रूप में नहीं पहुंच सकते। बल्कि हम रोकथाम के लिए सामुदायिक दृष्टिकोण को अपनाते हैं जिसमें यौन हिंसा और किसी का पीछा करने के मामलों को खत्म करने में हर किसी की भूमिका है।’’

प्रवेंशंस इनोवेशंस ने महिलाओं के खिलाफ हिंसा से निपटने के लिए विभिन्न प्रकार के कार्यक्रम विकसित किए हैं, जिसमें विश्वविद्यालय के सामाजिक विज्ञान, मनोविज्ञान, सामाजिक कार्य, कानून और महिला अध्ययन के विशेषज्ञ शामिल हैं। इस संदर्भ में यह भी समान रूप से महत्वपूर्ण है कि उन्होंने सख्ती से कार्यक्रम का मूल्यांकन किया है।

स्टेपलटन कहती हैं, ‘‘हमारे कार्य की अनोखी बात यह है कि कार्यक्रम की प्रभावशीलता पर हम शोध करते हैं। सब कुछ साक्ष्य-आधारित शोध पर निर्भर है।’’

इस शोध के आधार पर तैयार कई सबसे अच्छी पद्धतियों को प्रशिक्षण मॉड्यूल की एक शृंखला में बदलकर अमेरिका भर में कॉलेजों और अन्य संगठनों को दिया गया है।

स्टेपलटन कहती हैं, ‘‘पास खड़े दर्शकों से जुड़ा कार्यक्रम एक सार्वजनिक स्वास्थ्य मॉडल का उपयोग करता है- जिसका आधार है कि हिंसा की पहचान और रोकथाम की जा सकती है।’’

90 मिनट या फिर आधे दिन तक चलने वाली कार्यशालाओं में प्रतिभागी, दर्शक हस्तक्षेप की अवधारणा के साथ ही सीखते हैं कि यौन उत्पीड़न के मामले में, घटना के पहले, दौरान या बाद में हस्तक्षेप करने का निर्णय कैसे लें। चर्चा, समूह अभ्यास और भूमिका-निभाने से मिलकर तैयार ये कार्यशालाएं प्रतिभागियों को सशक्त बनाने के लिए परिकल्पित की गई हैं, जिससे उनमें ज़रूरत के समय कदम उठाने का आत्मविश्वास आए और वह खुद को सुरक्षित रखते हुए पीडि़त की सहायता कर सकें। इस तरह, प्रतिभागियों को समुदाय परिवर्तन की एक बड़ी प्रक्रिया का हिस्सा बनने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है, जिसमें लैंगिक हिंसा अस्वीकार्य है।

 

अपनी ताकत पहचानो
सामाजिक मार्केटिंग प्रयास ‘‘अपनी ताकत को जानो’’ ने दृश्यों की एक श्रंखला तैयार की है, जिसमें मुश्किल और तनाव से भरे दृश्य दिखाए गए हैं। इसे उत्पीड़न, पीछा, यौन हिंसा या बलात्कार की स्थितियों के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए डिजाइन किया गया है। 20 से भी अधिक संख्या में ये चित्र प्रत्येक संभव प्रारूप वेब तस्वीरें, स्क्रीन पॉप-अप, पोस्टकार्ड, बुक मार्क, पोस्टर और यहां तक कि बस विज्ञापन के रूप में उपलब्ध हैं।

ब्रांडिंग के इस दौर में, विषेश रूप से युवा लोगों के लिए, अभियान का नारा ‘‘अपनी ताकत को पहचानो, कदम बढ़ाओ, अपनी आवाज बुलंद करो, एक दर्शक के तौर पर आप चीज़ें बदल सकते हैं।’’ -इस नारे को पानी की बोतलों, बटन, जिम बैग और टॉर्च जैसी वस्तुओं पर भी जगह दी जा सकती है।

एक ऑनलाइन वीडियो में स्टेपलटन कहती हैं, ‘‘हम अभियान के अनुकूलन और संशोधन के लिए समुदायों के साथ मिलकर काम करते हैं... परियोजना की शुरुआत से यह एक प्रकार का गठबंधन है। हम वास्तव में यह पता लगाते हैं कि लक्ष्य कौन है? क्या बातें उनके लिए महत्वपूर्ण हैं? वे कैसे दिखते हैं? वे कैसी भाषा का प्रयोग करते हैं? समस्याओं के वे कौनसे उदाहरण है जो उनसे ताल्लुक रखते हैं।

स्टेपलटन के नज़रिए से, इसके स्पष्ट साक्ष्य हैं कि अभियान चलाकर लोगों में लैंगिक हिंसा के मुद्दे पर जागरुकता बढ़ाई जा सकती है और वास्तविक या संभावित हिंसा की स्थितियों में हस्तक्षेप करने की आशा बढ़ सकती है।

असली बात यह समझने की है कि ऐसी स्थिति में कोई भी अकेला नहीं है, बल्कि आप एक अधिक बड़े, आपकी चिंता करने वाले समुदाय का हिस्सा हैं, जो महिलाओं के खिलाफ हिंसा को समाप्त करने के लिए दृ़ढ़ संकल्प है और उनके अस्तित्व को अनुमति देने का मनोभाव रखता है।

 

हॉवर्ड सिनकोटा स्वतंत्र लेखक हैं। वह वर्जीनिया में रहते हैं।