अमेरिका में पढ़ाई: तब और अब

1960 और 1980 के दशक में अमेरिका में विद्यार्थी जीवन की एक झलक।

ऊषा हेलवेग और सिमरन सिंह

अगस्त 1982

अमेरिका में पढ़ाई: तब और अब

ऊषा हेलवेग (बाएं) को याद है कि उन्हें और अन्य भारतीय विद्यार्थियों को 60 के दशक के शुरू में अमेरिकी शिक्षा परिसरों की नई दुनिया उत्साहित करने वाली होने के साथ ही अक्सर चौंकाने वाली भी लगती थी। दो दशक बाद सिमरन सिंह (दाएं)और उनके समकालीन युवा भी शैक्षिक और सामाजिक स्तर पर उपलब्ध अवसरों को लेकर उतने ही उत्साहित थे। फोटोग्राफ: साभार ऊषा हेलवेग और सिमरन सिंह

 

कॉर्नेल, 1960

ऊषा हेलवेग

अपना प्रस्थान रिजल्ट आने तक टाल दो, ढेर सारा प्यार, डैडी,- 1 मई 1960 को मिले टेलीग्राम में यही सब लिखा था। मैंने दिल्ली विश्वविद्यालय से बी.ए. की परीक्षा पूरी कर ली थी और लंदन में अपने माता-पिता के पास जाने वाली थी, जहां से मुझे ग्रेजुएट अध्ययन के लिए अमेरिका जाना था। मेरे पिता अमोलक राम मेहता जॉन हॉपकिन्स और यूसीएलए मेडिकल संस्थानों में ़फुलब्राइट और रॉक़फेलर स्कॉलर रहे थे। उन्होंने मुझे विदेश में अवसरों के बारे में परिचित करा दिया था और वादा किया था कि यदि मैंने शैक्षिक स्तर पर अच्छा प्रदर्शन कर खुद को साबित किया, तो वह एडवांस्ड स्टडीज के लिए मुझे अमेरिका भेजने की व्यवस्था कर देंगे।

मेरे पिता एक गैम्बलर जैसे थे। परिवार की राय से अलग जाकर उन्होंने मेरे नेत्रहीन भाई वेद मेहता को 14 साल की उम्र में ही अर्कांसस स्कूल फ़ॉर द ब्लाइंड में भेज दिया था। बहुत-से लोगों ने उनसे कहा था, ‘‘विक्लांग बच्चे पर पैसा बर्बाद करने का क्या लाभ?’’ वेद ने अपने पिता की सोच को सही साबित किया। उसने प्रतिष्ठित फाई बीटा कापा ‘‘की’’ अर्जित की, अपनी ऑटोबॉयग्राफी लिखी, ऑक्सफ़र्ड और हार्वर्ड में पढ़ाई की और एक अच्छे लेखक के तौर पर ख्याति अर्जित की। हालांकि मैं एक लड़की थी और सात बच्चों में छठे नंबर पर थी, तो भी मेरे पिता फिर से सामाजिक कायदों को तोड़ने को तैयार थे और अपना निवेश सिर्फ अपने पुत्रों तक सीमित नहीं करना चाहते थे- वह मुझे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दिलाना चाहते थे, बजाय इसके कि मेरा विवाह करा दें। मैंने उनके प्रस्ताव को पाने के लिए सालों तक कड़ी मेहनत की। हो सकता है उनके दिमाग में दूसरे विचार आए हों, लेकिन मुझे विश्वास था और मैं अपने पुरस्कार को छोड़ने को तैयार नहीं थी। मेरा उनको जवाब था, ‘‘निश्चित उत्तीर्ण हो जाऊंगीं, 17 मई को आ रही हूं, ढेर सारा प्यार, ऊषा।’’ परिणाम कुछ भी हो, मैं अमेरिका जाने वाली थी।

शताब्दी की शुरुआत से ही अमेरिका के शिक्षा परिसरों में भारतीयों की मौजूदगी अपेक्षाकृत कम ही थी। आज़ादी के पहले अमीर भारतीयों के लिए पढ़ाई की पसंदीदा जगह इंग्लैंड होती थी। कला और साहित्य पर इसके ज़ोर से राष्ट्रवादियों को अपने अधिकारियों के लिए संघर्ष करने को आवश्यक दार्शनिक और कानूनी कौशल हासिल हो जाता था। भारत के आज़ादी के आंदोलन के बहुत-से बड़े लीडर, नेहरू और गांधी समेत, ब्रिटिश विश्वविद्यालयों से ही निकले थे। राजपरिवारों में ऑक्सफ़ोर्ड और कैम्ब्रिज को दुनिया के किसी भी स्थान पर किसी भी अन्य विश्वविद्यालय से अधिक प्रतिष्ठित माना जाता था। औपनिवेशिक काल में सिविल सेवा में चयन करने वाले अधिकारी भी ऐसी ही सोच रखते थे। जो थोड़े भारतीय विद्यार्थी अमेरिका गए थे, उन्होंने भारत की आज़ादी के काम को उत्प्रेरित किया और बहुत-से प्रमुख अमेरिकियों को भारत की आज़ादी के आंदोलन का साथ देने को प्रोत्साहित

आज़ादी के बाद भारतीय विद्यार्थी अपनी शिक्षा के लिए अमेरिका की तरफ देखने लगे। अमेरिका का आकर्षण इस बात को लेकर था कि वहां तकनीकी और व्यावसायिक क्षेत्रों में योग्यता के लिए अधिक अवसर थे। इसी समय एक्सचेंज प्रोग्राम शुरू हुए और वित्तीय मदद भी। एक एक्सचेंज प्रोग्राम जिसने भारत-अमेरिका बौद्धिक संपर्क को बढ़ावा दिया, वह था ़फुलब्राइट-हेस प्रोग्राम। इसी ने भारत में यूएसईएफआई की स्थापना की। वर्ष 1950 में इसकी स्थापना के बाद के 25 सालों में इसने 5,000 से अधिक भारतीय और अमेरिकी स्कॉलर को प्रो़फेसरों और शोध प्रोजेक्ट के तहत आदान-प्रदान का ज़िम्मा निभाया है। फ़ोर्ड फ़ाउंडेशन, रॉकफेलर फ़ाउंडेशन, हैज़ेन फ़ाउंडेशन, रोटरी इंटरनेशनल, कार्नेगी कार्पोरेशन और अन्य ने अमेरिका-भारत विद्वता आदान-प्रदान में अपना साथ दिया।

एक पूर्व विद्यार्थी याद करते हैं, ‘‘उस समय लगभग हर भारतीय विद्यार्थी को ट्यूशन फीस और रहने के खर्च के लिए भत्ता मिल जाता था।’’ वह संभवत: सही कह रहे थे: अमेरिकी शिक्षा संस्थान उस समय बड़ी तेज़ी के साथ विस्तार कर रहे थे। वित्तीय मदद आसानी से उपलब्ध थी और अमेरिका में माहौल इस तरह का था कि विकासशील देशों से आए लोगों की मदद की जाए।  इससे अमेरिकी विश्वविद्यालयों में अध्ययन के लिए उदारता के साथ स्कॉलरशिप के प्रस्ताव सामने लाए गए। इस तरह, वर्ष 1958 में अमेरिका में कुल 43,391 विदेशी विद्यार्थियों में से 2,585 विद्यार्थी भारतीय थे। वर्ष 1972 में 12,523 भारतीय विद्यार्थियों का समूह विदेशी विद्यार्थियों का सबसे बड़ा समूह था। वर्ष 1978 तक भारत का स्थान सातवां हो गया, जब अमेरिका में कुल 235,509 विदेशी विद्यार्थियों में से 9,080 भारतीय थे।

इनमें से कुछ विद्यार्थियों के पास भारत में नौकरियां थीं। ये छुट्टी लेकर अमेरिका में थे, जिससे कि प्रशिक्षण पाकर भारत में अपने कॅरियर को आगे बढ़ा सकें। कुछ और विद्यार्थी उन अमेरिकी शिक्षकों के चलते वहां पहुंचे थे जो भारत में रहे थे और शोध प्रोजेक्टों में इन विद्यार्थियों ने उनका सहयोग किया था। शिक्षक संभावनाशील विद्यार्थियों को अमेरिका जाकर आगे की पढ़ाई के लिए प्रेरित करते थे और कई बार उन्हें वित्तीय मदद दिलाने में भी मदद करते थे।

1960 में मैं जिस भारतीय विद्यार्थी समूह का साथी बनी, उसमें राष्ट्रवाद और देश की सेवा की भावना थी। वे भारत के भविष्य को लेकर आशावादी थे और जानते थे कि भारत जाकर बेहतर नौकरियां ले सकते हैं और देश के विकास में अपना मूल्यवान योगदान दे सकते हैं। मैंने राजनीतिक विज्ञान की पढ़ाई की थी, क्योंकि मेरी इच्छा भारत लौटकर उच्च सरकारी पद पाना था। अन्य लोकप्रिय विषयों में अर्थशास्त्र, कृषि, शहरी विकास, व्यावसायिक प्रशासन और विज्ञान थे।

इसके अलावा अपनी खुद की इकोनॉमी को भी ध्यान में रखना होता था। कॉर्नेल में पहले ही दिन मुझे इस समस्या से रूबरू होना पड़ा। मैं 1960 के शिशिर में कॉर्नेल आई। मेरी बस कुछ घंटे देर से थी, तो जब मैं कार से कैंपस पहुंची तो समय 5 बजे से ऊपर हो गया था। ऑफ़िस बंद हो चुके थे। अब रात कहां बिताई जाए? मेरे साथ कैब में आए एक अमेरिकी विद्यार्थी ने सुझाव दिया कि मैं विलॉर्ड स्ट्रेट हॉल में पंजीकरण करा लूं, जिसे विद्यार्थी संघ द्वारा संचालित किया जाता है। मैं वहां गई, तो पता चला कि विलॉर्ड स्ट्रेट में एक रात रुकने का खर्च आठ डॉलर पड़ेगा। मेरे दिमाग में 40 रुपये कौंधे, जो भारतीय मानकों के लिहाज से एक रात रुकने के लिए बहुत ज्यादा रकम थी। इस खर्च ने मुझे हिला दिया और मैं सो नहीं पाई। मैंने खुद से पूछा, ‘‘इतने महंगे देश में मैं खुद को किस तरीके से रखूंगीं?’’ अपना पैसा बचाने के लिए मैंने उस दिन डिनर नहीं लेना तय किया। सिर्फ मेरे पिता द्वारा दिए कुछ अंगूरों और सेब से काम चलाकर अपनी भूख को शांत किया।

भारतीय विद्यार्थियों के लिए अमेरिका में पैसे की चिंता तब भी रहती थी और अब भी है, क्योंकि सारी कीमतें रुपयों में देखते हैं। मैंने पाया कि मैं अपनेआप हर डॉलर मूल्य को पांच से गुना कर लेती थी और बैठते दिल के साथ सोचती कि रुपयों में इसकी कीमत कितनी हुई। कॉर्नेल में पढ़ाई के जाने का उत्साह भी मेरे इस डर को दूर नहीं कर पाया कि मैं वहां गरीब भारतीय विदेशी विद्यार्थी रहूंगीं। मैंने अमीर अमेरिकियों के ‘‘रॉलिंग इन डालर्स’’ के बारे में पढ़ा था और नई दिल्ली में एक अमेरिकी मित्र ने मुझे कैंपस जीवन की स्लाइडें दिखाई थीं। स्लाइडों के रंग में सब कुछ ‘‘समृद्ध’’ और ‘‘महंगा’’ दिखाई दे रहा था। लेकिन जब मैं आखिर में कैसकैडिला हॉल में व्यवस्थित हुई तो आश्चर्यजनक तौर पर पाया कि मेरे ज्यादातर समकालीन ग्रेजुएट विद्यार्थी मेरे ही आर्थिक स्तर वाले थे, किसी तरह संस्थान का खर्च चला रहे थे। इनमें से कुछ असिस्टेंसशिप पर थे, कुछ ़फेलोशिप पर थे, आंशिक स्कॉलरशिप पर थे या फिर अंशकालीन नौकरी कर रहे थे जिससे कि खर्च की भरपाई हो सके। हर किसी का व्यवहार मैत्रीपूर्ण था और किसी ने मुझे या अन्य ग्रेजुएट विद्यार्थी को इसलिए कमतर नहीं माना कि उसका बज़ट टाइट था।

मैं इस बात को लेकर अचरज करती थी कि मेरे को-एड डॉर्मिटेरी में रहने को लेकर मेरे माता-पिता क्या सोचेंगे। हालांकि लड़कों और लड़कियों के लिए अलग-अलग विंग थीं। मेरे लिए यह एक नया अनुभव था। मेरे माता-पिता ने मुझे कंजर्वेटिव, सिर्फ लड़कियों वाले स्कूल और कॉलेज में भेजा था, जहां पर शिक्षक भी महिलाएं ही थीं। मेरे भाइयों और कज़िन के अलावा मैं हमेशा स्त्रियों के आसपास ही रही। मैं न सिर्फ सहशिक्षा वाली कक्षाओं में पढ़ाई कर रही थी, बल्कि ऐसी ही डॉर्मिटेरी में रह भी रही थी। शुरू में मै डरी हुई थी, लेकिन मुझ यह जानने में ज्यादा समय नहीं लगा कि मेरे साथी ग्रेजुएट विद्यार्थी, अमेरिकी और अन्य, भी मेरे जितने ही पढ़नई को लेकर गंभीर थे और वे ऐस पुरुष नहीं थे जो मेरे पीछे लगे हों।

भारत के पुरुष विद्यार्थियों ने मुझे तुरंत ही अपनी ‘‘बहन’’ मान लिया। अन्य कैंपसों की तरह ही कॉर्नेल में भी भारतीयों को स्वत: ही इंडियन स्टूडेंट एसोसिएशन का हिस्सा बना लिया जाता था और वे भारतीय साथी बन जाते। उन्होंने मुझे सलाह दी कि कहां भोजन के लिए जाना चाहिए, सर्दियों में क्या पहनें, सस्ती चीज़ों के लिए कहां जाएं और यह भी कि अमेरिकी लड़कों से दूर रहूं। मैं एक सांस्कृतिक परिवार कीअत्यधिक नैतिक हिंदू लड़की थी। इसलिए वह सोचते थे कि मेरे व्यवहार में मेरी पृष्ठभूमि की झलक होनी चाहिए। शुरुआत में उनकी चिंता बहुत भरोसे वाली लगी क्योंकि विद्यार्थियों के समुद्र में मैं खुद को खोया हुआ महसूस कर रही थी।

मेरे पिता ने मुझे सलाह दी थी, ‘‘रोम में वही करो, जो रोमन करते हैं। मैं तुम्हें दीवार का फूल नहीं बनाना चाहता। साथी अमेरिकी विद्यार्थयों से मिलो-जुलो। डेट पर जाओ, और यदि प्यार में पड़ जाओ और शादी करना चाहो, तो तुम्हें मेरी और तुम्हारी मां का आशीर्वाद रहेगा। लेकिन अपनी नैतिकता बरकरार रखना। मैं नहीं चाहता कि तुम इसलिए शादी कर लो कि तुम्हें करनी है, या फिर कि तुम्हें पता नहीं था कि तुम क्या कर रही थी। खैर, यदि तुम किसी मुश्किल में पड़ जाओ, तो याद रखना कि हम तुम्हें बचा लेंगे।’’

मुझे किस तरह का व्यवहार करना चाहिए, इसको लेकर मेरे भारतीय भाई अलग तरीके से सोचते थे। कुछ का विचार था कि मैं संकोची बनी रहूं, जबकि कुछ का मानना था कि मुझे दुसरों से मिलना-जुलना चाहिए। पहले सेमेस्टर में मैं थोड़ा खामोश रही, सिथति का जायजा लेती रही और डॉर्म लाइफ़ और कक्षाओं के माहौल का अहसास करती रही। लाइब्रेरी के 11 बजे बंद होने के बाद अमेरिकी ग्रेजुएट विद्यार्थियों द्वारा मुझे ड्रिंक के लिए आमंत्रित करना मुझे सुखद लगा। एक शुक्रवार को, सब ने कॉकटेल या बीयर ऑर्डर की और मैंने कोकाकोला। मैं एक डिं्रक और दूसरी ड्रिंक में अंतर नहीं जानती थी। मैंने जीवन में शराब को देखा तक नहीं था। एल्कोहल वाले पेय पदार्थों के बारे में मैं सिर्फ इतना जानती थी कि इनसे नशा होता है और ये व्यक्ति को बुरा बना देते हैं। मैं अपनी कोकाकोला से संतुष्ट थी और किसी ने कुछ भी सुझाव नहीं दिया। मेरे दिल के अंदर मैं इस बात को लेकर चिंतित थी कि मेरे अमेरिकी मित्र डिं्रकिंग के बाद किस तरह का बर्ताव करेंगे। मैंने भारत में अमेरिका की ‘‘अनैतिकता’’ के बारे में सुना था। लेकिन दो-एक ड्रिंक के बाद सलाहकारों, प्रो़फेसरों, विभाग और राष्ट्रीय राजनीति पर चर्चा के बाद हम सब अपने-अपने ठिकानों की ओर लौट गए, खुशी के साथ कि हमने साथ में समय बिताया। ऐसे बहुत-से अनुभवों ने मेरा दायरा बढ़ाया। अपने साथी ग्रेजुएट विद्यार्थियों की ही तरह मैं भी पूरे ह़फ्ते कठिन मेहनत करती और सप्ताह के अंत में अन्य विद्यार्थयों, अमेरिकी और भारतीय, से संवाद की प्रतीक्षा करती। शनिवार का दिन अक्सर लॉंड्री और शॉपिंग जैसे कामों में बीत जाता। शाम को हम सात या आठ के समूह में मूवी देखने चले जाते और दोस्तों के साथ डिनर करते। भारतीय और अमेरिकी परिवारों ने मुझे बहुत बार डिनर पर आमंत्रित किया और कभी-कभी मुझे थियेटर या ऑपरा के लिए भी ले गए।

हमें सिर्फ विद्यार्थी ही नहीं समझा जाता था, बल्कि भारत के प्रतिनिधि के तौर पर देखा जाता था।  मैंने रेडियो और टीवी प्रोग्रामों में भाग लिया और रोटरी ग्रुप, लॉयन्स क्लब और अन्य नागरिक संगठनों में अपने देश के बारे में बोला। मुझे टॉम्पकिन और अन्य काउंटी में भारत के ‘‘दूत’’ की भूमिका अदा करना अच्छा लगा।  मुझे बताया जाता कि मैं ‘‘अनूठी’’ हूं, मेरी साडि़यों और पंजाबी ड्रेस के चलते। हम भारतीय विद्यार्थी उन सालों में अमेरिकियों के मन में भारत के बारे में भ्रांतियों या पूर्वाग्रहों को दूर करने के लिए भरसक प्रयास करते। मुझे इस बात का गर्व है कि आज भारत को लेकर अमेरिकियों के मन में जो सम्मान और सराहना है, उसमें हमने भी योगदान दिया।

उन शुरुआती सालों में अमेरिकी कैंपसों में कम ही भारतीय महिलाएं थीं और वे अधिकतर भारत के उच्च शिक्षा संस्थानों से थी या ग्रेजुएट विद्यार्थियों की पत्नियां थीं। वे युवाओं से ज्यादा नहीं मिलती थीं, चाहे भारतीय हों या अमेरिकी। ज्यादा कंजर्वेटिव भारतीय विद्यार्थी, पुरुष और महिला, दोनों, अमेरिकियों से अलग ही रहते थे। अन्य लोग मिलते-जुलते थे और कैंपस में जीवन का आनंद उठाते थे।

होटल एडमिनिस्ट्रेशन के विद्यार्थी शायद सबसे ज्यादा मिलनसार थे। उन्हें अक्सर अपने माता-पिता से अच्छी रकम मिलती थी और उन्हें कॉर्नेल्स स्टेटलर इन जैसी जगहों पर प्रैक्टिकल ट्रेनिंग के लिए भुगतान भी मिलता था। कंजर्वेटिव विद्यार्थियों के बजाया, ये ही वे विद्यार्थी थे जिन्होंने मुझे अलग-अलग वाइन को पहचाने और अच्छी स्टीक को सराहना सिखाया। उन्होंने ही मेरी स्टेटलर में हॉस्टेस के तौर पर समर जॉब हासिल करने में मदद की। वे मुझे पार्टियों में लेकर गए और मुझे प्रोटेक्ट भी किया।

भारतीय विद्यार्थियों ने कुलमिलाकर शैक्षिक दृष्टि से भी बेहतरीन प्रदर्शन किया है। साठ और सत्तर के दशक वाले भारतीय विद्यार्थियों की अंग्रेजी पर जबर्दस्त कमांड थी। ब्रिटिश शिक्षा प्रणाली के तहत पढ़ाई के कारण उन्हें व्याकरण और वाक्य संरचना की समझ थी। उन्हें शुरु में अपरिचित वस्तुनिष्ठ प्रश्नपत्रों से मुश्किल थी, लेकिन रटकर पढ़ाई के चलते उन्होंने उसमें भी मास्टरी हासिल कर ली। वे आंशिक तौर पर परिवार की इज्जत या सम्मान से प्रेरित रहते थे, जो इस पर निर्भर होता था कि विद्यार्थी ने कितना अच्छा प्रदर्शन किया। वे इस बात को लेकर भी चिंतित रहते थे कि जिन लोगों ने उन पर खर्च किया है, उन्हें निराश नहीं करें।

मैं अपने कुछ साथी ग्रेजुएट विद्यार्थियों से मिली हूं जो अपने-अपने क्षेत्रों में उच्च पदों पर हैं और भारत के विकास में योगदान कर रहे हैं। उनकी सफलता की दास्तां सुनकर मुझे महसूस होता है कि मैं ही उनसे अलग रह गई हूं- मैं उन कुछ लोगों में हूं जिन्होंने अमेरिका में ही रहने का निर्णय किया।

ऊषा हेलवेग वेस्टर्न मिशिगन यूनिवर्सिटी में अंशकालीन इंस्ट्रक्टर और रिसर्च एडमिनिस्ट्रेटर हैं। वह और उनके पति ऑर्थर हेलवेग स्मिथसॉनियन ग्रांट पर भारत आए थे और आप्रवासन के भारत पर असर पर शोध कर रहे थे।

 

स्टैनफ़र्ड, 1980

सिमरन सिंह

अमेरिका की सबसे प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी, स्टैनफ़र्ड यूनिवर्सिटी, में अपनी पहली परीक्षा देते वक्त मुझे पिछली रात को उतना तनावग्रस्त होने की ज़रूरत नहीं थी। जब प्रो़फेसर ने थोड़ी मुस्कान के साथ पेपर मुझे थमाए, तो मैं कुछ रिलैक्स हुई। ‘‘मुझे उम्मीद है कि आप इन सवालों के जवाब देने में उतना समय लगाएंगे, जितना कि मैंने इन पर सोचने में लगाया है। गुड लक। मैं आप सभी से शुक्रवार को मिलूंगा।’’

और वह बाहर चले गए।

मैं स्टैनफ़र्ड द्वारा अपने विद्यार्थियों पर भरोसा करने को देखकर हतप्रभ थी। वे अपनी परीक्षा, जहां चाहे, वहां दे सकते हैं। आप कोकाकोला और फ्रेंच फ्राई साथ ला सकते हैं, टेबल पर अपना पैर रख सकते हैं और क्लास में ही अपना पेपर पूरा कर सकते हैं। या फिर आप इसे अपने घर ले जा सकते हैं, या फिर कॉफी हाउस में या फिर लाइब्रेरी में और तीन घंटे बाद आकर इसे दे सकते हैं।

आप चाहें तो चीटिंग भी कर सकते हैं, क्योंकि आपके आसपास कोई देखने वाला नहीं है। लेकिन सभी स्टैनफ़र्ड विद्यार्थियों ने ऑनर कोड पर हस्ताक्षर किए होते हैं, जो उन्हें नैतिक रूप से बाध्य करता है कि वे चीटिंग न करें।

‘‘आप खुद के प्रति सच्चे बने रहें’’ की नीति, जो विद्यार्थियों पर पूरा भरोसा जताती है, यूनिवर्सिटी की खासियतों में से एक है। एक और खासियत है कि यहां पर एक तिमाही के बाद विद्यार्थी शिक्षकों का मूल्यांकन करते हैं, उनके व्याख्यानों, स्पष्टता, विषय में दिलचस्पी जगाने की योग्यता और उन तक पहुंच को लेकर।

यहां पर कक्षाएं भी उससे भिन्न हैं, जैसा कि मैंने भारत में अनुभव किया था। सेंट्रल हीटिंग वाले कॉन्फ्रेंस टाइप कक्षों में प्रो़फेसर खुले गले वाली टी-शर्ट में अनौपचारिक पोशाक में पढ़ाने आ जाते हैं। वह अपनी डेस्क पर झुककर, ठोड़ी एक घुटने पर रखकर लेक्चर देता है। वह कहता है कि विद्यार्थी उसे उसके प्रथम नाम से बुलाएं। मुझे यह सब प्रेरित करने वाला लगा कि अपने क्षेत्र के जानेमाने विशेषज्ञों के साथ इतना रिलैक्स हो सकते थे।

स्टैनफ़र्ड के शिक्षकों में 13 नोबेल पुरस्कार विजेता और चार पुलित्ज़र पुरस्कार विजेता शामिल हैं। यहां के शिक्षक अपनी ज़िम्मेदारी को काफी गंभीरता से लेते हैं। वे क्लास में विद्यार्थियों के साथ लंच ले सकते हैं और फोर-लेटर वर्ड बोल सकते हैं, लेकिन जब टर्म पेपर का मौका होगा, तो वे पूरी रात आपके साथ बैठेंगे। ये विश्व-प्रसिद्ध प्रो़फेसर और लेखक अपने एकांतवास में नहीं रहते, बल्कि अपने टाइपराइटर पर झुके होते हैं, अपने कमरे का दरवाज़ा खुला रखकर, आपका स्वागत करने के लिए। अधिकतर अपना फोन नंबर देने को लेकर उदार होते हैं और परामर्श या बीयर पीने के निमंत्रण के लिए भी।

प्रो़फेसर से मित्र बने लोग आपके सबसे बड़े आलोचक होते हैं। आप अपने टर्म पेपर को लिखने में जितना समय लगाते हैं, वे भी लगभग उतना ही समय उसके विश्लेषण में लगा देते हैं। प्रतिक्रियाएं किसी भी तरह की हो सकती हैं। ‘‘तुम कभी नहीं कर पाओगे,’’ से लेकर ‘‘हां, तुम्हारे पास वह चीज़ है, जो चाहिए।’’ हो सकता है, आपके पेपर में कुछ भी न रहा हो, लेकिन आपके कितना भी अज्ञानी होने के बावजूद क्लास में इसको नहीं दिखाया जाता।

हमें बताया गया, ‘‘बेकार सवाल वही है जो पूछा नहीं गया।’’ और आप अपने सलाहकार से कुछ भी पूछ सकते हैं- अपने कॅरियर, अपनी निजी जिंदगी, वित्तीय हालात, आदि। आप मुश्किल सवालों के उत्तर के लिए कह सकते हैं।

एक साझा सवाल अंशकालिक नौकरी के बारे में रहता है। बहुत-से विद्यार्थियों को पढ़ाई के साथ कमाई करनी होती है या फिर वे ऐसा करना चाहते हैं। अक्सर आप अपने सलाहकार के द्वारा मुहैया करवाई गई टीचिंग या रिसर्च असिस्टेंस्शिप के जरिये अपना ब्रेड-बटर (बीयर और पोस्टेज स्टैंप भी) का खर्च निकाल सकते हो। स्टैनफ़र्ड के बज़ट का पहला सिद्धांत है कि एक बार कोई विद्यार्थी यूनिवर्सिटी में दाखिला पा गया तो उसे पैसे की कमी के चलते अयोग्य नहीं माना जाएगा। उसकी कुशलता के हिसाब से उसे जूनियर क्लास को पढ़ाने, पेपर ग्रेडिंग करने या फिर शोध कार्य करने के लिए कहा जा सकता है। लाइब्रेरी, कंप्यूटर केंद्रों और कैफेटेरिया में अक्सर अंशकालीन नौकरी मिल जाती है।

किसी भी परिस्थिति में, खुद को सपोर्ट करना आश्चर्यजनक रूप से आसान है, क्योंकि नौकरी के अवसर काफी अधिक हैं और औसत भुगतान भी चार डॉलर प्रति घंटे का है। और आप इस्तेमाल की हुई चीजें लें, तो 10 डॉलर में टीवी ले सकते हैं, 25 डॉलर में बाइक और 250 डॉलर में कार।

अंडरग्रेजुएट स्तर पर विद्यार्थी के प्रोग्राम में अनिवार्य कोर्स आधे से भी कम होते हैं। बाकी कोर्स वह अपने हिसाब से चुनने को स्वतंत्र है।  अपने मेजर कोर्स का चयन खुद करके वह फिल्म सौंदर्य, ध्वनि विज्ञान और फिजियोथेरेपी जैसे विषयों का चुनाव कर सकता है। विद्यार्थी, बाद में, उस विषय में विशेषज्ञता हासिल कर सकता है, जिसमें उसे लगे कि उसकी वाकई दिलचस्पी है। उसके पास पेरिस में फ्रांसीसी इतिहास और नैरोबी में तीसरी दुनिया की समस्याओं के अध्ययन का भी विकल्प होता है: स्टैनफ़र्ड के दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में कैंपस हैं, जहां विद्यार्थी एक साल की पढ़ाई कर सकते हैं और उन्हें सारी सुविधाएं हासिल होती हैं।

ज्यादातर अनिवार्य कोर्स में विद्यार्थियों को उन्हीं परिस्थितियों में काम करना होता है, जो वे ग्रेजुएशन के बाद अनुभव करेंगे। उन्हें स्वतंत्र निर्णय लेने को बाध्य किया जाता है और अपनी ली हुई जिम्मेदारी को स्वीकारने को कहा जाता है। पत्रकारिता के विद्यार्थियों को, उदाहरण के लिए कैंपस से बाहर एक बीट चुनने को कहा जाता है। यह स्वास्थ्य, शिक्षा, शरणार्थी या अपराध, कुछ भी हो सकती है। लेकिन इसका अर्थ है कि आप वहां जाओगे, अस्पताल या पुलिस स्टेशन में उसी तरह समय बिताओगे, जैसे कि लाइब्रेरी में। इसका अर्थ है समाचारों को सूंघ पाना और उसकी महक का पीछा करना- जब तक कि आपको अपनी रिपोर्ट मिल नहीं जाती। आइडिया यह है कि आपको यूनिवर्सिटी जीवन के सुरक्षित माहौल से बाहर ले जाकर उस कॅरियर में ले जाना, जो आपने चुना है। आपको उस दिलचस्पी और तनाव को स्वीकार करवाना या उसमें आनंद महसूस करना, जिसके साथ आप रहने वाले हो।

प्रशिक्षण के हिस्से के तौर पर पत्रकारिता और प्रबंधन के विद्यार्थी एकसाथ आते हैं और पत्रकारिता वाले प्रबंधन वालों का इंटरव्यू लेते हैं। इस संवाद को वीडियोटेप पर रिकॉर्ड किया जाता है और फिर इसे सुनाया जाता है, इसका विश्लेषण कर, इसमें सुधार के लिए।

एक भारतीय विद्यार्थी संभवत: स्टैनफ़र्ड से अमेरिकी विद्यार्थी की तुलना में ज्यादा हासिल कर सकता है, क्योंकि किसी भी चीज़ को स्वत: संभव मानकर नहीं चल सकता। बहुत-से गैर-शैक्षिक कोर्स अमेरिकियों को हमेशा ही उपलब्ध रहते हैं, इसलिए उनका रुझान कई बार उनकी उपेक्षा का रहता है। लेकिन अधिकतर विदेशी विद्यार्थी जैज़ सीखने, बाड़बंदी, कार ठीक करना, एरोबिक्स, बॉडी मसाज या पांच अलग-अलग तरह के मार्शल आर्ट सीखने को लेकर उत्साहित रहते हैं।

स्टैनफ़र्ड में पुस्तकालय जादुई हैं। ज्यादातर विभागों में छोटे पुस्तकालयों के अलावा 20 से ज्यादा शोध पुस्तकालय हैं। ‘‘स्टैनफ़र्ड: फ्रॉम फुटहिल्स टू द बे’’ में पीटर सी. एलन कहते हैं, मेयर अंडरग्रेजुएट और ग्रीन ग्रेजुएट लाइब्रेरी में ‘‘68 मील का शेल्फ स्पेस उपलब्ध है, जहां 28 लाख वॉल्यूम आ सकते हैं और 1,700 विद्यार्थी बैठ सकते हैं।’’ विद्यार्थियों की पुस्तकों तक ज्यादा पहुंच के लिए गुटेनबर्ग एक्सप्रेस स्टैनफ़र्ड यूनिवर्सिटी और यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिफ़ोर्निया, बर्कली को प्रतिदिन शटल सेवा के माध्यम से जोड़ती है।

पुस्तकालय जल्द ही लोगों को अपना आदी बना लेते हैं। आप किसी गमले में लगे अच्छे पौधे के सहारे, बिना खलल के घंटों तक अध्ययन करते बिता सकते हैं। आप माइक्रोफ़िल्म सेक्शन में भारत के आपातकाल का विश्लेषण कर सकते हैं, ग्रीन लाइब्रेरी में रुककर टाइम्स ऑफ़ इंडिया या इंडिया टुडे पढ़ सकते हैं या फिर हूवर इंस्टीट्यूशन लाइब्रेरी में पढाई कर सकते हैं, जहां अलेक्सांद्र सोलज़ेनित्सिन ने कभी अपने संस्मरण लिखे थे। जो गंभीर शोध के काम में लगे होते हैं, वे लाइब्रेरी कंप्यूटरों का इस्तेमाल करते हैं। एक ही डेटाबेस से किसी विषय पर प्रकाशित सारी सामग्री के प्रिंट ले सकते हैं। कुछ विद्यार्थियों के पास अपने कमरे में वीडियो डिस्प्ले टर्मिनल होते हैं, जो कैंपस के मुख्य कंप्यूटर से जुड़े होते हैं।

सही कोड पंच करने पर आपका कंप्यूटर आपको दिनभर की खबरें बता देगा, दोस्त या एमआईटी से आई मेल के बारे में बता देगा या फिर आपको कोई गंदा चुटकुला भी सुना सकता है। कुछ विद्यार्थी कंप्यूटरों के इतने आदी हो जाते हैं कि खाना-पीना भूल जाते हैं और स्टैनफ़र्ड के सेंटर फ़ॉर एजुकेशनल रिसर्च में ही सो जाते हैं, जहां पर लो ओवरहेड टाइमशेयरिंग सिस्टम यानी लोट्स है। यह दिन में 24 घंटे खुला रहता है।

बहुत-से प्रो़फेसर गंभीर विद्यार्थियों को अपनी प्राइवेट लाइब्रेरी को नि:शुल्क इस्तेमाल करने देते हैं। विभाग अक्सर आपको अपने शोध के लिए ज़रूरी किसी भी तरह की सामग्री की व्यवस्था कर सकते हैं या फिर आपके विषय पर किसी विशेषज्ञ को बुलाकर उसका व्याख्यान करा सकते हैं। विद्यार्थियों को उतनी फंडिंग की अनुमति होती है जितनी कि उन्हें अपने शोध के लिए चाहिए होती है। उदाहरण के तौर पर, एलन हमें बताते हैं, ‘‘स्टैनफ़र्ड में हर साल ढाई करोड़ डॉलर इंजीनियरिंग शोध पर खर्च होते हैं। इसमें 200 ग्रांट और अनुबंध शामिल हैं।  इसका दायरा सार्वभौमिक है, सूक्ष्मदर्शी इंटीगे्रटेड सर्किटों से लेकर बाह्य अंतरिक्ष तक।’’

भारत के किसी विद्यार्थी के लिए अमेरिका में परीक्षा कोई असाधारण बात नहीं होती। चूंकि कक्षा में बिताए हर घंटे के लिए आपको पूरे साल तीन घंटे घर पर भी मेहनत करनी पड़ती है, इसलिए परीक्षा से पहली रात खुद को दोष देने या घड़ी को अपने पर हंसते हुए आगे बढ़ते नहीं देखना पड़ता। वैसे भी, आखिरी परीक्षा के आपकी ग्रेड में सिर्फ 20 प्रतिशत ही जुड़ते हैं। बाकी कक्षा में भागीदारी, टर्म पेपर और साल के दौरान आपकी सतत प्रगति पर निर्भर करता है। यदि आप किसी परीक्षा के दौरान स्वस्थ नहीं हैं या फिर किसी अन्य कोर्स में व्यस्त हैं, तो आप इसे बाद में लिए जाने की व्यवस्था के लिए कह सकते हैं। स्टैनफ़र्ड की नीति यह है कि यह देखा जाए कि कोई विद्यार्थी कोर्स से कितना सीख पाया, न कि यह कि वह तीन घंटे में पेपर पर कितना लिख सकता है। स्टैनफ़र्ड का माहौल और वहां मिलने वाली सुविधाएं आपको पढ़ने को प्रेरित करती हैं, और आप शिक्षा को शिक्षा की दृष्टि से लेते हैं, न कि किसी परीक्षा की दृष्टि से।

स्टैनफ़र्ड की डिग्री से आपके कॅरियर के बेहतर होने के आसार बनते हैं। लेखक पीटर एलन अपनी पुस्तक में कहते हैं, ‘‘शैक्षिक गुणवत्ता की रेटिंग ज्यादा से ज्यादा ऐसा विज्ञान है जो सटीक नहीं है। लेकिन देशभर में हाल ही में साथी शिक्षकों के बीच किए गए सर्वेक्षण बताते हैं कि स्टैनफ़र्ड के प्रो़फेसरों में विशिष्ट बात है। वे इसके स्कूल ऑफ़ एजुकेशन और स्कूल ऑफ़ बिजनेस को देश में पहले स्थान पर आंकते हैं। इंजीनिरिंग और मेडिसिन में दूसरे स्थान पर और कानून की पढ़ाई के मामले में तीसरे स्थान पर। यूनिवर्सिटी के 17 विभाग अपने विषय में देश में पहले पांच स्थानों में हैं।

ज्यादातर ग्रेजुएट विद्यार्थियों के पास यूनिवर्सिटी से जाने से पहले ही निश्चित नौकरी होती है। भारतीय ग्रेजुएट ज्यादातर इंजीनियरिंग विभाग के होते हैं और उनमें से ज्यादातर सिलिकॉन वैली में काम हासिल कर लेते हैं, जिसके बीच स्टैनफर्ड स्थित है।

कैंपस में साल में एक बार अजीब परिदृश्य तैयार होता है: यह है जॉब ़फेयर, जहां लॉकहीड मार्टिन, ह्यूलेट-पैकर्ड, ़फेयरचाइल्ड और अन्य शीर्ष कंपनियां अपने अधिकारियों को स्टैनफर्ड के विद्यार्थियों की भर्ती के लिए भेजती हैं। अच्छी तरह से प्रेस किए थ्री पीस सूट पहने ये अधिकारी विद्यार्थियों को अपने कैटेलॉग और ब्रोशर बांटते हैं और उन्हें नौकरी के आकर्षक प्रस्ताव देते हैं। टी-शर्ट, जीन्स और स्लिपर्स पहने विद्यार्थी इन कैटेलॉग को अपने बैग में रख लेते हैं, बाद में विचार करने के लिए।

क्लासरूम के बाहर जीवन अनौपचारिक होता है, लेकिन कड़ी मेहनत की ज़रूरत होती है और अचरज भी सामने आते हैं।

कैंपस में रहने वाले विद्यार्थियों के सामने बहुमंजिली इमारत या कम मंजिली इमारत के दो बेडरूम अपार्टमेंट में रहने का विकल्प रहता है और ये दोनों ही, उनमें रहने आने वाले विद्यार्थियों की ज़रूरतों के अनुरूप बने होते हैं। कुछ भी चुनें, आपको रूममेट के साथ रहना सीखना होगा, जो आपका ज़रूरत का मित्र होगा या फिर वाकई दोस्त, वह इस बात पर निर्भर करेगा कि आपके दोस्त, फोन कॉल और पूरी रात टाइपिंग उस पर क्या असर डालते हैं।

स्टैनफ़र्ड ऐसी जगह है, जहां आप बाइक से आ-जा सकते हैं। इसके बहुत से रास्ते ऑटोमोबाइल के लिए बंद रहते हैं। अपनी बाइकों पर तेज़ी से जाते विद्यार्थियों के साथ स्टैनपफर्ड के आठवें प्रेसिडेंट डोनाल्ड केनेडी भी साइकिल पर नज़र आते हैं। उनके पास हार्वर्ड यूनिविर्सटी की तीन डिग्रियां हैं। मृदुभाषी प्रेसिडेंट हर सुबह 10 किलोमीटर तक दौड़ लगाते हैं और अपने साथ आने के लिए विद्यार्थियों को आमंत्रित करते हैं।

बहुत-से संकोची विदेशी विद्यार्थियों के लिए बेक्टेल इटरनेशनल सेंटर अच्छी जगह है जहां से वे 3560 हैक्टेयर वाले इस कैंपस में अपने पैर जमाना और दोस्त तलाशना शुरू कर सकते हैं। इस सेंटर में विदेशी विद्यार्थियों और उनकी पत्नियों के लिए हर ह़फते कॉफी आयोजन के अलावा, भाषा कक्षाएं, इंटरनेशनल कुकिंग, लोक नृत्य, बड़े आकार का टीवी और मैत्रीपूर्ण कर्मचारी होते हैं। चाहे उनके अपने देश युद्ध कर रहे हों, यहां पर बहुत-से इराकी और ईरानी दोस्त बन जाते हैं।

एक बार आपने दोस्त बना लिए तो कैंपस आपके जीवन का बहुत ही परिपूर्ण करने वाला अनुभव हो सकता है। सामान्य तौर पर उत्साहपूर्ण अहसास यह होता है कि, ‘‘मैं अपने यहां के दिनों का जितना आनंद लूं, कम लगता है।’’ एलन एक विद्यार्थी को उद्धृत करते हैं, ‘‘स्टैनफ़र्ड में बोरियत के लिए आपको बहुत मेहनत करनी पड़ेगी। लगभग हर जो चीज़ आप यहां करना चाहते हैं, उसके लिए कोई क्लब, टीम, संगठन या दोस्त आपको मिल जाएगा।’’

लगभग हर दिन नाटक, व्याख्यान, कंसर्ट, पूरी रात चलने वाले लोक नृत्य और पार्टियां होती हैं। पास में ही रहने वाले जोन बेज़ यहां गायन के लिए आ जाते हैं। यूनिवर्सिटी हर ह़फ्ते कम से कम 10 अलग-अलग फ़िल्में दिखाती है। इनमें समकालीन हिट फिल्मों के साथ ही, फ्रेंच और इटालियन क्लासिक, और इतिहास से जुड़ी विविध तरह की फिल्में शामिल होती हैं।

साल के सबसे बड़े आयोजनों में से एक स्टैनफ़र्ड और बर्कली (ऐसी यूनिवर्सिटी जिसे स्टैनफ़र्ड के विद्यार्थी कैलिफ़ोर्निया में दूसरी सबसे बेहतर यूनिवर्सिटी मानते हैं।) के बीच होने वाला वार्षिक फुटबाल गेम है। इसके टिकट कई महीने पहले अग्रिम बिक जाते हैं। गेम पास आने के समय टिकटों की कालाबाज़ारी होती है।

इसके अलावा काफी हाउस है, कैंपस के बीच में छोटा सुखद ठिकाना है। यहां पर लकड़ी की मजबूत बेंच हैं और यहां बढि़या कॉफी मिलती है। जिन विद्यार्थियों के पास समय नहीं होता, वे भी यहां पर दिखते हैं। आप एक-दो घंटे के आनंद को तो सुनिश्चित मान सकते हैं। प्रतिभाशाली विद्यार्थी गाते हैं, नृत्य करते हैं और नाटक प्रस्तुत करते हैं, बिल्कुल नि:शुल्क। यदि आप इस तरह की प्रकृति के हैं कि शोरशराबे और विद्यार्थियों के संगीत-नृत्य के बीच शांत बने रह सकते हैं, तो आप यहां पर अपनी थीसिस लिख सकते हैं या फिर स्क्रैबल गेम खेल सकते हैं।

स्टैनफ़र्ड में मेरी पहली तिमाही की शुरुआत के दौरान मैं अपनी किताब के साथ कॉफी हाउस की टेबल पर था, तभी मैं आश्चर्यचकित रह गया, यह देखकर कि 20 पुरुषों और महिलाओं का समूह अपने को बेडशीट में लपेटे तेज़ी से चला आ रहा है। यह स्पष्ट था कि उन्होंने बेडशीट के नीचे कपड़े नहीं पहने थे। यह ‘‘टोगा पार्टी’’ के साथ मेरा परिचय था। यह अक्सर तिमाही की शुरुआत के समय नए लोगों का स्वागत करने के लिए होती है।

कॉफी हाउस 11 बजे बंद हो जाता है। लेकिन यदि आपका उत्साह अभी भी उच्च स्तर पर है, तो आप द ऑएसिस की ओर प्रस्थान कर सकते हैं। अमेरिका में यह विद्यार्थियों के 10 सर्वाधिक लोकप्रिय ठिकानों में से है। बीयर का बड़ा पिचर और बिना छिली मूंगफलियों का बैग (छिलके आप सीधे फर्श पर फेंकते हो।) आपका तीन बजे तक साथ दे पाएंगे, जब यह बंद हो जाता है।  उसके बाद डेनीज़ जैसी कॉफी शॉप का नंबर आता है, जो 24 घंटे खुली रहती है।

बीयर के दौर सप्ताहांत तक सीमित होते हैं। बाकी का ह़फ्ता कड़ी, कड़ी मेहनत का होता है। स्टैनफ़र्ड में होने का एक लाभ यह है कि यहां हर दूसरा विद्यार्थी अपने विषय के बारे में अच्छी समझ रखता है। बातचीत हर स्तर पर ज्ञानवर्धक होती है। आपके दोस्त कौन हैं, इसके आधार पर आपको जैवरसायन, कंप्यूटर साइंस या हृदय प्रत्यारोपण की अच्छी जानकारी हो सकती है।

साल के दरम्यान कभी विद्यार्थियों का एक समूह तीसरी दुनिया के देशों में कुपोषण के जवाब में व्रत का आयोजन करता है और पूरे स्टैनफ़र्ड से इसमें भाग लेने को कहते हैं। यह व्रत फ़र्स्ट वर्ल्ड को यह हकीकत बताने के लिए है कि भूख का अहसास क्या होता है।

बहुत-सी विद्यार्थी डॉर्मेटरी और आवास तीसरी दुनिया के मसलों पर जागरूकता बढ़ाने के लिए कोर्स आयोजित करते हैं। हमार्सकोल्ड हाउस, उदाहरण के लिए, इस पर कोर्स आयोजित करता है कि पश्चिमी प्रेस किस तरह तीसरी दुनिया के मसलों को तोड़मरोड़ कर प्रस्तुत करती है। इस मसले पर गर्मागर्म चर्चा देर रात तक चलती है।

स्टैनफ़र्ड के सातवें प्रेसिडेंट रिचर्ड लिमैन ने कहा था, ‘‘एक आरामदायक यूनिवर्सिटी का विचार एक तरीके से अंतर्विरोध वाला है… हमारा अस्तित्व इसलिए है कि पुरुषों और महिलाओं के दिमागों को झकझोरें और उन्हें सक्रिय बनाएं।’’

अमेरिका में भारतीय विद्यार्थी के लिए बहुत-से मूल्य बदल जाते हैं। इसी तरह प्रभाव भी। ज्यादातर यह सोचकर आते हैं कि सभी अमेरिकी बच्चे ड्रग्स लेते हैं और सभी अमेरिकी महिलाओं को पाना आसान होता है।

और हां, कैंपस में सेक्स का अस्तित्व उसी तरह से है जैसा कि अन्य अमेरिकी कैंपस में। लेकिन यहां इनकार करने या गुप्त रखने जैसा व्यवहार नहीं है। बल्कि पुरुष और महिला विद्यार्थी खुलकर साथ रहते हैं। गर्भनिरोधक उपायों के लिए नि:शुल्क परामर्श है, समलैंगिकों के अपने अलग क्लब हैं।

इस सुंदर कैंपस में भी अपराधों का अस्तित्व है। स्टैनफ़र्ड में साइकिल की चोरी सिद्धहस्त कला है। और आपको यह मानकर चलना होगा कि तीन साल में एक बार आपकी साइकिल कोई ले जाएगा। बलात्कार जैसे ज्यादा गंभीर अपराधों की कैंपस के विभिन्न स्थलों पर पुलिस की राउंड द क्लॉक निगरानी के जरिये रोकथाम की जा रही है।

रात आठ बजे के बाद यूनिवर्सिटी द्वारा महिलाओं को अपने घर सुरक्षित पहुंचाने के लिए कैंपस से एक किलोमीटर की दूरी तक एस्कॉर्ट सेवा उपलब्ध कराई जाती है।

लेकिन पालो आल्टो जैसे छोटे कस्बे में होने के चलते स्टैनफ़र्ड कैंपस काफी सुरक्षित है। यह ऐसा कैंपस है जो आपको धीरे-धीरे बिगाड़ता है। इसकी सर्दियां ईस्ट कोस्ट के बसंत की तरह होती हैं। पहाडि़यों और खाड़ी के बीच यहां मनोरंजन के लिए पर्वतों के साथ ही बीच भी हैं। यूनिवर्सिटी की स्पेनिश वास्तुकला बहुत सुंदर है। इसके महान हरित अंडाकार परिदृश्य के बीच खड़े होकर नया विद्यार्थी विस्मय के साथ इस इमारत के तराशे हुए स्तंभों, साफ नीले आकाश और स्वर्णिम लहराकार पहाडि़यों को देखता है। बहुत ही सुंदर परिदृश्य, जिसके बारे में आर्किटेक्ट फ्रैंक लॉयड राइट ने कहा था, अमेरिका के बेहद खूबसूरत कैंपस में से एक।

और अप्रैल में जब सर्दियों का सामान पैक कर दिया जाता है, तो दरवाज़े और खिड़कियां खुली रखी जाती हैं जिससे कि ताज़ा हवा और नरम घास की खुशबू अंदर आए। स्टैनफ़र्ड में बसंत को अपने अनूठे तरीके से मनाने के लिए एक दिन रिज़र्व रहता है। सुबह से लेकर शाम होने तक पूरा रास्ता वाहनों के लिए बंद रहता है। मीलों दूर तक आप सुपरपॉवर बैंड द्वारा बजाई जा रही स्टैनफ़र्ड की पसंदीदा धुनों को सुन सकते हैं, जबकि हज़ारों विद्यार्थी एक-दूसरे से टकराते हुए पूरी रात नृत्य करते बिता देते हैं। बसंत की इस रात्रि में बीयर और पॉपकॉर्न रहते हैं। इसी रात्रि को ग्रेजुएट होने वाली सीनियर क्लास यूनिवर्सिटी को गुड बाय कहती है।

हालांकि यह गुड बाय हमेशा के लिए नहीं होती। स्टैनफ़र्ड एल्युमनी एसोसिएशन में 50,000 से ज्यादा सदस्य हैं, जो अपने संस्थान से न्यूज़लेटर, कॉन्फ्रेंस और समर प्रोग्राम के माध्यम से संपर्क में रहते हैं। अलग-अलग देशों में बहुत-बहुत सालों तक बाएं कोने में यूनिवर्सिटी की स्टैंप लगे खाकी लिफाफे लेटर-बॉक्स में आवाजाही करते रहते हैं।

मूलत: प्रकाशित: अगस्त 1982


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