आपके भोजन से जुड़ी है पृथ्वी की सेहत

इस वर्ष वर्चुअल जयपुर साहित्य महोत्सव में अमेरिकी दूतावास नई दिल्ली द्वारा प्रायोजित एक सत्र में लेखक जोनाथन सैफरन फोर और पत्रकार जेफरी गेटलमैन के बीच चर्चा हुई कि किस तरह से हमारी दैनिक गतिविधियां जलवायु परिवर्तन को रोकने के प्रयासों में प्रभावी साबित हो सकती हैं।

मई 2021

आपके भोजन से जुड़ी है पृथ्वी की सेहत

पुस्तकों में लोगों को साथ-साथ लाने का सामर्थ्य होता है- चाहे वे दुनिया के दूसरे हिस्से में ही क्यों न रहते हों।

अमेरिकी दूतावास नई दिल्ली के नॉर्थ इंडिया ऑफिस (एनआईओ) ने जलवायु परिवर्तन विषय पर जयपुर में हाल ही में हुए वचुअर्ल लिटे्रचर फेस्टिवल- 2021 के सत्र को प्रायोजित किया। टीमवर्क आर्ट्स प्राइवेट लिमिटेड द्वारा आयोजित इस समारोह में पिछले एक दशक में करीब 2000 वक्ता भाग ले चुके हैं। इनमें ऑपरा विनफ्रे, पॉल बीटी और अमर्त्य सेन जैसी हस्तियां शामिल हैं। इस समारोह ने भारत और दुनिया भर से 10 लाख से अधिक साहित्य प्रेमियों की मेजबानी की है।

एनआईओ अमेरिका और भारत के लोगों के बीच संपर्क के तमाम उपक्रमों में सहयोग करता रहा है जिसमें उत्तर भारत की कला और संस्कृति के संदर्भ में इस समारोह में होने वाले आयोजन भी शामिल हैं। इस वर्ष, जलवायु परिवर्तन विषय से जुड़े सत्र के प्रायोजन के अलावा एनआईओ ने रेजिंग वुमेन्स वॉयसेज़ इन बिजनेस जैसे शॉर्ट वीडियो की सिरीज़ को भी प्रायोजित किया। इसके अतिरिक्त, ‘‘एन इनकनविनियंट सीक्वल-ट्रुथ टू पावर’’ की स्पेशल स्क्रीनिंग भी की गई। पूर्व अमेरिकी उपराष्ट्रपति अल गोर की इस फिल्म में जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दे के समाधान के लिए अमेरिकी सरकार की मदद के बारे में बताया गया है।

28 फरवरी को दूतावास द्वारा प्रायोजित सत्र में अमेरिकी लेखक जोनाथन सैफरन फोर और न्यूयॉर्क टाइम्स के दक्षिण एशिया ब्यूरो चीफ जेफरी गेटलमैन ने 2019 में लिखी फोर की किताब ‘‘वी आर द वेदर- सेविंग द प्लेनेट बिगिंस एट ब्रेकफास्ट’’ पर चर्चा की। फोर और गेटलमैन ने इस बात पर विमर्श किया कि किस तरह से प्रतिदिन की गतिविधियां कुछ समय के बाद जलवायु में बदलाव को रोकने के हमारे प्रयासों पर असर डाल सकती हैं।

अमेरिकी मिनिस्टर काउंसलर ऑफ़ कांसुलर अफेयर्स (एमसीसीए) डोनाल्ड एल. हेफ्लिन ने कहा कि इस सत्र को प्रायोजित करके  अमेरिकी दूतावास को उम्मीद है कि ‘‘जलवायु परिवर्तन को रोकने की अमेरिका की प्रतिबद्धता प्रकाश में आएगी।’’

एमसीसीए ने कहा, ‘‘भारत, अमेरिका और पूरी दुनिया में इस बारे में काफी कुछ किया जाना बाकी है। मुझे भरोसा है कि विश्व के दो सबसे बड़े लोकतंत्र और पहली एवं पांचवी विशाल अर्थव्यवस्था वाले देश अमेरिका और भारत इस चुनौती के लिए तैयार होंगे। लेकिन लोगों की वैयक्तिक तौर पर भी जिम्मेदारियां हैं कि हम अपनी भूमिका अदा करें। लेखक जोनाथन सैफरन फोर इसी पहलू पर ध्यान दे रहे हैं।’’

प्रस्तुत है फोर और गेटलमैन के बीच हुए संवाद के मुख्य अंश:

हमें बताएं कि यह किताब किस बारे में है और आपने इसे क्यों लिखा?

कहानियां हमेशा समस्याओं की बुनियाद पर लिखी जाती हैं। यह मेरा अनुभव है, चाहे वह उपन्यास हो या कुछ और। उपन्यासों के मामले में मुझे समस्या का ठीक से नहीं पता। मैं इसे आसानी से व्यक्त नहीं कर सकता। (यह है बस) मेरे अंदर कुछ असहज-सा है या फिर कुछ ऐसा है जो अनसुलझा है। उपन्यास एक प्रयास है, समस्या को सुलझाना इसका काम नहीं, लेकिन शायद उसे साझा करने के लिए शब्द दे सकता है। गैर-कथा, जहां तक मैं सोचता हूं, समस्याओं से संबंधित होता है। मै जानता हूं किताब की शुरुआत में ही, कि वह क्या है जो मुझे कुरेद रहा है।

‘‘ईटिंग एनीमल्स’’ मेरी पहली गैर-उपन्यासी किताब थी, वह भी मेरी एक प्रतिक्रिया थी जो मेरे बचपन से चली आ रही एक समस्या से जुड़ी थी। यह मेरे जीवन की सबसे पुरानी समस्याओं में से एक थी और वह थी, मांस खाते हुए मुझे कैसा महसूस होता है?

‘‘वी आर द वेदर’’ भी एक समस्या की देन थी जिसे मैं व्यक्त कर पाया। यह किताब किसी व्यक्ति को जलवायु संकट के इस दौर में कैसे रहना चाहिए, इस बारे में थी। मुझे पता था कि इसका विज्ञान क्या है, क्योंकि अब सभी को पता है कि विज्ञान क्या है, खास कर इस बिंदु पर। मुझे पता था कि शब्दों का तानाबाना क्या होता है। मुझे यह भी पता था कि किस तरह के मार्चों के लिए कैसे पोस्टर बनाए जाते थे जिनमें मुझे जाना चाहिए। लेकिन रोजमर्रा के जीवन की बात की जाए या फिर उन विकल्पों की बात की जाए जो मैं अपने और अपने परिवार के लिए चुनूंगा- उनके बारे में ठीक-ठीक कुछ नहीं कह सकता या सिर्फ इतना पता है कि मुझे इस बात का पता था कि मैं बहुत कुछ नहीं कर पा रहा हूं। यह एक ऐसी समस्या थी जिसे अनदेखा करना मैंने आसान पाया। लेकिन यह कहीं ना कहीं दिमाग में रह जाती थी। दो-तीन साल पहले एक उम्मीद की खिड़की खुली जब समाचारों में इस पर जोरशोर से चर्चा होनी शुरू हुई और मुझे लगता है,  उसी वक्त मेरे भीतर का संकट मेरे दिमाग में जगह बना गया।

मैं भाग्यशाली हूं कि मैं लेखक हूं क्योंकि मैं चीज़ों के बारे में सोचने के लिए समय और स्थान तय कर सकता हूं। इसीलिए मैंने तय किया कि क्यों न कुछ समय और स्थान इस सवाल के लिए निर्धारित किया जाए कि जलवायु संकट के मौजूदा दौर में एक व्यक्ति को किस तरह से रहना चाहिए।

मुझे आपका यह आइडिया विशेष दिलचस्प लगा कि यदि कोई समस्या बहुत बड़ी है तो यह अविश्वसनीय तौर पर बड़ी हो जाती है और यदि यह इतनी बड़ी और भयावह है तो इसमें हम अपना दिमाग नहीं खपा सकते और यह हमें निष्क्रिय बना देती है। इस बारे में थोड़ा और बताएं और यह भी कि इससे कैसे निपटें।

जलवायु में बदलाव किसी भी सूरत में अनोखी बात नहीं है। ऐसी चीज़ जिसे हम जान सकते हैं लेकिन हम उस पर यकीन नहीं करते। दिन भर में ऐसी 10 बातें सोच सकते हैं जो इस श्रेणी में सटीक बैठ सकती हैं। उनमें से सबसे ज्यादा स्पष्ट बात है कि हम सबको मरना है। यह ऐसी बात है जिसे हम सब जानते हैं लेकिन हम रास्ता खोज लेते हैं कि उस पर कोई बात न हो। यहां तक कि हम यह यकीन करना छोड़ देते हैं कि ऐसा कुछ होने वाला है।

इस बात में बहुत व्यापक तौर पर एक राय है कि मानव जनित जलवायु बदलाव का दौर चल रहा है।  लेकिन सब कुछ जानते-समझते हुए भी, मेरा मानना है कि हममे से बहुत-से लोग, जिसमें मैं खुद को शामिल करता हूं, इस बात पर आसानी से यकीन करने को तैयार नहीं।

हम इससे कैसे निपटेंगे? यह तो बहुत व्यापक है, बहुत बुरा है और बहुत खतरनाक भी।

यह स्पष्ट नहीं है कि हम ऐसा कर पाएंगे। कदम उठाने में बहुत-सी रुकावटें हैं। वास्तव में यह दिलचस्प होगा अगर इसकी तुलना कोविड से की जाए। हमने कोविड से निपटने के लिए जैसा किया, वैसा क्यो किया। ऐसा क्यों था कि निजी तौर पर अधिकतर लोग खुद को अलग-थलग रखने को तैयार थे, मास्क पहनने के इच्छुक थे, लगातार हाथ धोते रहने को तैयार थे। ऐसा क्यों था कि शहर के शहर खुद की अर्थव्यवस्था को ठप रखने को तैयार थे, देश खुद की अर्थव्यवस्था को ठप करने के इच्छुक थे, नीतियां तेजी से बदल रही थीं, कौन यात्रा कर सकता था और कहां, कहां और कब कौन-सा कारोबार खुल सकेगा, यह सब तुरंत ही निर्धारित हो रहा था।

मेरा मानना है कि यह सब इसलिए हो रहा था क्योंकि हम अमूर्त तौर पर डरे हुए भी थे और डरे हुए नहीं भी थे। यह डर दूसरों के लिए भी नहीं था और ना ही इसका संबंध भविष्य में भावी पीढी को लेकर था, बल्कि यह डर खुद अपनी सेहत को लेकर था।

अभी भी बहुत-से ऐसे लोग हैं जो पीडि़त हैं और जलवायु में बदलाव के कारण उनकी मौत हो रही है। ये वे लोग नहीं है जो ऐसे देशों में रह रहे हैं जो आज जो कुछ भी हम झेल रहे हैं, उसके लिए ज्यादा जिम्मेदार हैं।

तो अब सवाल उठता है कि हम ऐसे लोगों और ऐसे देशों के नेताओं पर कुछ करने के लिए कैसे दबाव बनाएंगे जिन्हें जलवायु में बदलाव के असर का भय नहीं है? यह हम सबके सामने एक चुनौती है।

मेरी किताब में, मैंने इसे एक कानूनी और व्यवस्थित परिवर्तन के रूप में बहुत नहीं देखा है जो कि जरूरी है। मैंने इसे व्यक्ति में निजी बदलाव के संदर्भ में देखने की कोशिश की है। यह भी जरूरी है जहां एक व्यक्ति के रूप में हम अपनी मानसिकता बदलते हुए वे चीजें करने को तैयार हो जाएं जो जरूरी हैं और मेरी भावना है कि इसे रवायत और रोजमर्रा के काम जैसा होना होना चाहिए।

अगर मैं आप लोगों से सवाल पूछूं कि, आप किसी स्टोर में जाते हैं और आप कोई ऐसी चीज़ देखते हैं जिसे आप पसंद करते हैं, तो आप खुद को उसे चुराने से कैसे रोकेंगे? क्या आपके दिमाग में एक सामाजिक करार की स्मृतियां आनी चाहिएं जो आपके दिमाग में निश्चित रूप से उस दुकानदार के बारे में कोई ठोस अहसास लाए कि क्यों आपको उससे या उसकी जेब से पैसे नहीं लेने चाहिए। मेरा अनुमान है कि आप कहेंगे कि, मेरे जेहन में इसे लेकर कोई विचार -विमर्श नहीं हुआ। मैंने उसे नहीं चुराया क्योंकि मैं ऐसा करना नहीं चाहता था। ऐसा ही कुछ मैं हूं।

तो, इसी तरह से हमें उस रास्ते की तलाश है जो हमें उस तरह का इंसान बना दे जो हमारे ग्रह से कोई चीज़ चुराना ना चाहे या उसके भविष्य से भी कोई चीज़ चुराने की इच्छा न हो। और मैं सोचता हूं कि इसे करने का सबसे अच्छा तरीका है हम इस बोझ को अपने सिर से उतार दें कि हमें इस बारे में किसी बहुत ठोस भावना की जरूरत है, बस हमें अपनी आदतों को थोड़ा दिशा देने की जरूरत है।

किताब में मैंने खासतौर से भोजन और खानपान के तरीके के बारे में लिखा है जो कि वैयक्तिक तौर पर पर्यावरण के संदर्भ में देखें तो हमारा सबसे महत्वपूर्ण चयन होता है। अगर हम अपने लिए कुछ नियम तय कर लें जैसे कि कुछ ऐसी आदतें जिनके बारे में हमें सोचना ही नहीं हैं, हमें उनको निभाना है क्योंकि वे हमारा अक्स है और ये तो हम करते ही हैं। ऐसा करना कहीं आसान होगा और इसके सफल होने की गुंजाइश भी कहीं ज्यादा होगी बजाय इसके कि हम अपने आप से कभी न खत्म होने वाली जिरह करते रहें।

मैं भोजन के मसले पर बात करना चाहता हूं क्योंकि यह आपकी दिलचस्पी वाला बड़ा विषय क्षेत्र है। इसी विषय पर आपकी किताब है और इसी पर आपने पहले भी किताब लिखी है। आपने कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा के बारे में बात की है जो विभिन्न खाद्य पदार्थों के उत्पादन के लिए जरूरी होती है। बीफ के लिए 6.61, चीज़ के लिए 2.45 और पोर्क के लिए 1.72 है। ये विभिन्न प्रकार के भोजन के लिए अलग-अलग है जैसे कि अंडा, दूध और जैसे-जैसे आप शाकाहार की तरफ जाएंगे तो इसे तैयार करने में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा काफी कम हो जाती है। गाजर के लिए 0.07 की मात्रा चाहिए। यह बीफ में अनुमानित मात्रा का तकरीबन 100वां हिस्सा है। लेकिन इस पर अच्छे से अमल में आपको भी दिक्कत आई। आपने खुद मांस को भोजन से हटाने को लेकर दिक्कत का सामना किया है क्योंकि यह हमारी आदत में शुमार है। अब मैं आपसे वह सवाल पूछ रहा हूं जो आपने अपनी किताब में सामने रखा है। आप कैसे इतने क्रांतिकारी बदलाव के लिए जिरह कर सकते हैं, आप अपने बच्चों को शाकाहारी के रूप में कैसे बड़ा कर सकते हैं और कैसे मांस सिर्फ अपनी सहूलियत के लिए खा सकते हैं?

मांस को लेकर आपका नजरिया कुछ भी हो लेकिन हर किसी को पता है कि हम किसी गंभीर विषय पर बात कर रहे हैं। यह जब-तब होता रहता है कि मैं विषय पर अपना व्याख्यान दे रहा हूं और श्रोताओं में से कोई खड़ा हो जाएगा और कहने लगेगा। आप अपने को क्या समझते हैं, आप कैसे किसी से भी यह कह सकते हैं कि मांस मत खाओ? मेरे माता पिता यही खाते थे, मेरे दादा दादी भी खाते थे और यह स्वास्थ्यवर्धक भोजन है। और मैं हमेशा ऐसे सवालों का जवाब एक ही तरह से देता रहा हूं कि, जाहिर तौर पर इस बात से सहमत हूं कि यह महत्वपूर्ण है। अगर मैं मैं इस बारे में व्याख्यान दे रहा होता कि हमें क्यों कार्बोनेटेड पानी पीना चाहिए बजाए इसके कि सामान्य पानी, कोई नहीं खड़ा होता और न ही कोई नाराज होता। लोग इसलिए नाराज होते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि दांव पर काफी कुछ लगा है। इसलिए, मैं सोचता हूं कि शुरुआत के लिए इतना ही ठीक है कि इसके कुछ मायने हैं और यह इस तरह से अहम है कि यह हमें आलोचना का पात्र बना रहा है। कई बार इसकी वजह से हमें आक्रामक या फिर रक्षात्मक भी होना पड़ता है।

अगर आप मुझसे पूछेंगे कि अगले 10 साल में अमेरिका के आधे लोग शाकाहारी हो जाएंगे इसकी कितनी उम्मीद है तो मैं कहूंगा कि शून्य। इस बात की कितनी गुंजाइश है कि अमेरिका में खाया जाने वाला आधा भोजन अगले 10 सालों में शाकाहारी होगा, तो मुझे यकीन है कि ऐसा हो पाएगा। तो अगर हम इसे एक पहचान के नजरिए से देखना चाह रहे हैं तो ये बहुत अलग मामले होंगे। अगर हम इसे इसके परिणामों के आधार पर समझना चाह रहे हैं, नुकसान और हिंसा में कमी के लिहाज से, तो ये आपको एक जैसे ही लगेंगे। लेकिन हम इसकी पहचान को लेकर इतने ज्यादा आदी हो चुके हैं कि हम केवल उसी नजरिए से देख सकते हैं। हम उसी में खुद की पहचान की पूर्णता भी तलाशते हैं। इसीलिए कोई कैसे खाता है, इसके बारे में हमारे पास कई तरह के और जटिलताओं से भरे नाम हैं। कोई वीगन है , कोई शाकाहारी, कोई मिश्राहारी, कोई फ्लेक्सीटेरियन तो कोई रेड्यूसटेरियन है। मैं भी इसको कुछ उसी नजरिए से देखता था। मैं संवदेनशील था और पहचान का दावा अच्छा अहसास करता है। लेकिन हमें इन अच्छी और बुरी भावनाओं से सतर्क रहना होगा क्योंकि ये हमें हमारे नतीज़ों के उस मकसद से दूर ले जाती हैं जो हम वास्तव में चाहते हैं।

बल्कि, अगर हमारे संवाद में थोड़ा और लचीलापन होता, थोड़ा और रहम होता, थोड़ी और नम्रता होती- अगर हम यह कह पाने में सक्षम होते, देखिए मैं अपने मानकों के हिसाब से क्या सही है उसके बारे में जानता हूं किसी और के नहीं। लेकिन मैं जानता हूं कि, करने लायक सही काम क्या है, यह भी मुझे पता है कि, मैं उसे हमेशा नहीं कर सकताक्योंकि मेरे अंदर लालसा है, क्योंकि मैं आलसी हूं, क्योंकि मेरे अंदर कमी है और क्योंकि हम इंसान हैं। शायद तभी हम वास्तव में कुछ ज्यादा हासिल कर पाने में सक्षम हो सकेंगे।

ऐसा हमेशा होता है, लगभग हर बार जैसे ही मैं अपने विचार रखता हूं, कोई मेरे पास आकर खडा हो जाता है और कुछ ऐसी बातें करता है कि, मैंने आपकी किताब पढ़ी है। मैं पिछले तीन ह़फ्तों से शाकाहार पर हूं। इसके प्रति विश्वास बढ़ रहा है। मुझे बेहतर प्रतीत हो रहा है। एक तरफ यह बात बढि़या लगती है। दूसरी तरफ, मै उनसे कहता हूं आप यह सुनिश्चित कीजिए कि आप सफलता के लिए आगे बढ़ रहे हैं, असफल होने के लिए नहीं, क्योंकि आप जो कुछ कह रहे हैं उसका आधार तो सिर्फ 21 बार का भोजन है। तब क्या होगा जब 22वीं बार के खाने में आप कुछ ऐसा खा लें जो किसी प्रकार का मांस हो। तो फिर आप शाकाहारी नहीं रह जाएंगे। अभी कुल जितने शाकाहारी हैं, उसके पांच गुना पूर्व शाकाहारी हैं। ऐसा इसलिए है कि क्योंकि हम उसी संदर्भ से सोचते हैं। मैं मानता हूं कि या तो सब कुछ हैं या फिर कुछ नहीं। यह दोतरफा है या तो आप हैं या नहीं।

यदि इसके बजाय वह व्यक्ति मेरे पास आता और कहता कि आपने भोजन और पर्यावरण के संबंध या पशु कल्याण के बारे में जो कुछ भी कहा, मैंने उसके बारे में काफी कुछ सोचा और मैं कोशिश कर रहा हूं कि मैं कम से कम मांस खाऊं और पिछले तीन ह़फ्तों से मैं इससे दूर हूं। इसके बाद अगर वह आदमी 22 वें भोजन में मांस खाता तो वह कह सकता था कि 22 में से 21 बार मैंने वैसा कर दिखाया। यह बड़ी बात होती। सफलता का यह प्रतिशत शानदार होता। बस बताने का थोड़ा सा तरीका बदल दिया जाए, तो आप जो कुछ भी करने की कोशिश कर रहे हैं उसके नतीजों को पूर्ण सफलता या असफलता की श्रेणी में रखा जा सकता है। इसलिए मैं कहूंगा कि इन बातों को कठोर पहचान से नहीं जोड़ा जाना बेहतर होगा। यह कारण और प्रभाव की ऐसी कड़ी है जिसमें हम सब प्रतिभागी बनने की चाह रखते हैं।

अब विचार यह है कि मानव प्रजाति के अस्तित्व के लिहाज से आदिम मानव आज के मुकाबले बहुत अलग तरह से रहता था। कुछ लोग कहते हैं कि हम लोग मांस खाने के लिए बने हैं क्योंकि हमारा शरीर इस तरह से बना है कि वह कुछ मात्रा में मांस को अब-तब खा सकता है। तो ऐसे में जब हमें पर्यावरण को बचाने के लिए अपनी आदत को बदलना हो तो इसे आप कैसे देखते हैं?

अगर आप मुझसे कहें कि क्या आप उस ग्रह की कल्पना कर सकते हैं जहां लोग यदाकदा थोड़ा-बहुत मांस खाते हों, तो मैं कहूंगा कि जहां हम सब रहते हैं, वह उससे बहुत ही अलग किस्म का ग्रह होगा और शायद वहां वैसी पर्यावरण संबंधी समस्याएं भी नहीं होगी जो हमारे सामने है। हमारे सामने आज समस्या है, आप जानते हैं कि लोग खा रहे हैं, उनकी प्लेट का दो-तिहाई हिस्सा मांस से भरा होता है और वह भी रोजाना कम से कम दो बार।

मैं यह कह कर अपनी बात शुरू करना चाहूंगा कि मैं ऐसे किसी भी पोषणविद से नहीं मिला जो यह कहता हो कि मांस खाना ज़रूरी है। मांस, बहुत-से अन्य खाद्य पदार्थों जैसे कि केक, की तरह पूर्णत: सेहतमंद हो सकती है। बात सिर्फ इतनी है कि हम इसे अधिक मात्रा में नहीं खाना चाहते। और हमें यह भी पता है कि इसका संबंध हृदय रोग, कैंसर और तमाम दूसरी स्वास्थ्य समस्याओं से है, लेकिन मेरा सोचना है कि जब लोग ऐसा कहते हैं तो उसको लेकर तमाम तरह के आग्रह और हठधर्मिता है।

ऐसी बहुत सी चीजें है जो शिकारी करते थे लेकिन अब हम नहीं करते। शिकारी चश्मे नहीं लगाते थे। क्या यह आज मेरे चश्मा पहनने के खिलाफ एक दलील हो सकती है? किसी भी सूरत में नहीं। मैं सोचता हूं कि मानव इतिहास के अधिकतर कालखंड में अधिकतर लोगों द्वारा मांस खाया जाता था, इस महत्वपूर्ण तथ्य को स्वीकारना चाहिए। मैं इसे खारिज नहीं कर रहा। भविष्य को लेकर मेरा दृष्टिकोण वास्तव में भविष्योन्मुखी नहीं है। यह संरक्षणवादी ज्यादा है। यह कुछ इस तरह का है जैसे अतीत में हमारे पूर्वज खेती किया करते थे और जैसे उनका खानपान था। मैं मांस नहीं खाना चाहता और मैं उसे नहीं खाऊंगा। और मैं वैसे ही स्वस्थ हूं जैसे कोई भी दूसरा। लेकिन साथ ही मैं अपनी पसंद को दूसरों पर थोपना भी नहीं चाहता। मेरी दिलचस्पी अविवादित और स्प्षट विज्ञान को दूसरे के साथ साझा करने में है।

और जब बात जलवायु में बदलाव की आती है, तो विज्ञान शायद इससे ज्यादा स्पष्ट नहीं हो सकता। आईपीसीसी (इंटर गवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज), जिसे संयुक्त राष्ट्र में जलवायु विज्ञान के श्रेष्ठतम मानक के रूप में देखा जाता, ने कहा है कि हमें पेरिस समझौते के लक्ष्यों को हासिल करने की उम्मीद तब तक नहीं है जब तक हम पशुओं को लेकर अपने भोजन के तौरतरीकों में बदलाव नहीं लाएंगे।

तो ,जब आपने यह कहा कि थोड़ा-बहुत मांस यदाकदा खा लेना- हो सकता है कि यह सब उस लिहाज से सही हो, जिस रेखा पर हम सबक ी सहमति बन रही हो कि हम उससे आगे नहीं बढ़ सकते। यदि हम यदाकदा से अधिक मांस खाएंगे, तो हमारे पास कोई भी सदाजीवी भोजन प्रणाली नहीं हो सकती। उसके आगे सम्मानपूर्वक असहमति का मार्ग हम सबके पास मौजूद है।



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